सोमवार, 30 जनवरी 2017

कुछ दोहे ...नेतन , जनता, वोट

टोपी का उपयोग अब, नेता की पहचान।
कुरता भी अब बन गया, नेता जी की शान।।

टोपी हाथी पर चढ़ी, कहीं साइकिल संग।
हाथ हिलाती चल रही, टोपी बनी दबंग।।

नेता मूरख बनाते, जनता को हर बार।
जान बावले बन रहे, देख वोट अधिकार।।

वादों की बातें चली, हाँ सपनों की बात।
दूर दूर पहुँच सपन, बस में रही न बात।।

मोटे मोटे पेट भी, दौड़ लगाते आज।
किस्से और कहानियां, निभा रही है साथ।।

लूटा जनता को बहुत, अब जनता की बार।
देर सबेर ना कीजिए, मत है एक हथियार।।

🇮🇳👆✍🏻सत्येंद्र कात्यायन

शनिवार, 21 जनवरी 2017

कंगना


कंगना
नमोस्तुते माँ शारदे!
सभी साथियों को प्रणाम
आज समर्पित मन के भाव , ****
***
कंगना
कंगना हो तो प्रीत जड़ा
मन को झंकृत कर दे
कंगना
कंगना हो तो स्वप्न सरीखा
मन को मन में भर दे
कंगना
कंगना हो तो स्वर स्वर में
राग रागिनी भर दे
कंगना
कंगना हो तो अंतरतम को
दीपक ज्योति कर दे
कंगना
कंगना हो तो घुमड़ घुमड़ते बादल
में बिजली भर दे
कंगना 
कंगना हो तो अंग अंग को 
रूमानी कर दे
कंगना
कंगना हो तो हिय की हिय से
उर की उर में 
चमक दमक सब भर दे
कंगना 
कंगना हो तो जल थल में
अंतर हिलोर सी भर दे
कंगना
कंगना हो तो वीणा के तारों में 
संवेदी सरगम भर दे
कंगना 
कंगना हो तो कोयल के स्वर को
मधुर मधुरतम कर दे
कंगना
कंगना हो तो प्रेम डगर पर
प्रीत दीवानी कर दे 
कंगना
कंगना हो तो वंशी की धुन पे
कोई जवानी लिख दे
कंगना
कंगना हो तो राधा को मीरा
मीरा को राधा कर दे
कंगना
कंगना हो तो मीर के दर्द को
ग़ालिब के हवाले कर कर दे
कंगना
कंगना हो तो गोरी की कलाई में
यौवन सुख भर दे
कंगना 
कंगना हो तो गीत ग़ज़ल सब
रल मिल गिद्दा पा ले
कंगना 
कंगना हो तो अपनापे की
कोई इबारत लिख दे 
कंगना 

..
#सत्येंद्र कात्यायन🙏🙏🙏

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

भड़ास....
आज गली मोहल्ले में समाज का संस्कारित रूप कहीं खो सा गया है , आज शब्दब्रहम के माध्यम से अपने मोहल्ले की इस बिगडती तस्वीर को सामने रखना चाहता हूँ जहाँ शरीफ लोगो का जीना तो मुश्किल हो ही चुका है वरन शुकून से सोने भी नहीं दिया जा रहा है . खतौली के सैनी नगर मोहेल्ले में चंद शराबी और मस्खरेबाज युवाओ की मण्डली आय दिन गली गलौच और शराब के नशे में धुत डीजे के शोरगुल में इतने मशगूल और आनंद में डूब जाते है की दूरे लोगो कीपरेशानी से उनका कोई वास्ता नहीं होता तब यदि कोई कुछ कहता भी है तो कुछ समय तो शांति पर कुछ मिनटों बाद वही सब कुछ. या फिर मरने मारने पर उतारूहो जाते है . बिलावजह ही इस प्रकार का कृत्य जहाँ परेशानी का सबब बनता है वहीँ दूसरी ओर बच्चो पर भी इन सब गतिविधियों का गलत असर पड़ता है . इन्हें पुलिस का खोफ नहीं है . कुछ तो ऐसे है जिनके बच्चे बड़े हो रहे है पर उनके कृत्य कहीं भी अनुकरणीय नहीं ..हम सब मोहोल्लों में ऐसे छोटे बड़े गुंडों से परेशां है और विरोध का कोई बड़ा नतीजा नहीं निकलता उल्टा नतीजा भुगतने की धमकियाँ जरूर मिल जाती है . और होता भी है गरीब और शरीफ सरे आम पिटता है ..तमाशा बनता है और फिर से सब कुछ दोहराया जाता है . ध्वनी प्रदूषण के साथ साथ ये अश्लीलता और नशेखोरी का वातावरण कहीं भीतर तक कचोटता है . क्या शरीफ को/ सभ्य लोगो को शांति से जीने का हक़ नहीं ? , उसे शुकं से , चैन से सोने का हक़ नहीं ..है..ऐसे मुहफट, शराबी गुंडे  इंटरनेशनल गलियों के प्रणेता इस देश के हर मुहल्ले में कम या ज्यादा मात्रा में है. ध्वनी प्रदुषण और शराब और शांति भंग को लेकर कानून बना है पर  ये कानून बस कानून है ..इन पर अमल कितना हुआ है सब जानते है . .लगता है ये कानून से ऊपर है .ये मोहल्ले के छुटपुट गुंडे ही आगे जाकर खूंखार अपराधी बन बैठते है ..इन्हें शह देने वाले हम सब है ...हम सहते है ...सहते चले जाते है ...इतना की कोई उफ्फ तक करने को भी तैयार नहीं ... मै सभी
देशवासियों से अनुरोध करूंगा ऐसे लोगो का सामना संगठित होकर करे . ये
चुप्पी बहुत भरी पड़ सकती है  ...समस्त पत्रकार बन्धुओं से भी अनुरोध है
की लोगो की इन समस्याओ को भी पूरी ईमानदारी के साथ प्रकाशित करे ताकि एक सभ्य समाज सुसंगठित हो सके, सुरक्षित हो सके .... जय भारत जय जगत
# सत्येन्द्र कात्यायन ] खतौली

रविवार, 15 सितंबर 2013

ऐ खाक नशीनों उठ बैठों...लेख

ऐ खाक नशीनों उठ बैठों...

अखिलेश सरकार की दोषपूर्ण नीतियाँ और फिलवक्त जारी एकपक्षीय कार्यवाहीं से साफ जाहिर होता है कि यह सरकार मात्र एक विश्ैाष सम्प्रदाय के मोह में , कुर्सी के लोभ में सियासी दांव पेंच खेल रही है जिसमें बेचारी बेगुनाह जनता पिस रही है और हर तरफ नफरत का जहर फैला है। इन सब की जिम्मेदार सरकार की गलत नीतियाँ ही हैं और अब सरकार अपनी गलती में कोई सुधार करने के बजाय , अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय इन सब घटनाओं को विपक्ष की करतूत बता रही हैं। सियासत में इस तरह का खेल पहले कभी नहीं खेला गया परंतु अब सियासत का घिनौना चेहरा सभी के सामने है जरुरत है उसे पहचानने की। सरकार को ये जान लेना चाहिए की ये दांव उस पर बहुत भारी पडने वाला है। सरकार जनता के शोषण पर तूली है। हर जगह नफरत की आग फैलायी जा रही है जो सरकार के नाकामयाब होने का सबूत है ।-
मुज़फ्फरनगर में भडके कवाल कांड को तूल दिया सियासत ने और सरकार की एक पक्षीय कार्यवाही ने। अखिलेश सरकार एक तरफ तो लैपटाप का वितरण करने में मशगूल है तो दूसरी तरफ लोगो में नफरत का जहर घोलने में भी कोई कोर कसर इस सरकार के नुमांइंदों ने नहीं छोडा है।
मुज़फ्फरनगर के जानसठ कस्बे के कवाल में हुए बेरहम कांड के बाद बवाल मचा। बवाल शायद ज्यादा दिन ठहर नहीं पाता परंतु जब सियासत की रोटियाँ सिकनें लगी तो इसकी आग बेतरतीब बढती चली गया और आलम ये है कि 27 अगस्त को घटी ये घटना आज भी सियासी जंग बनी हुई है और भिड रहें है इंसान इंसानों से । 
सरकार अब अपनी गलती स्वीकार करने में हिचक रही है। सब जानते है कि सपा के शासन काल में गुंडा राज पनपता है और वो गुंडा राज आम जनता का चैन -शुकून छीन लेता है। घटना के बाद जुमे के दिन हुई पंचायत/सभा ने इसे नया मोड दिया इसी सभा में ज्ञापन भी सौंपे गये , तब तो प्रशासकों ने ऐसी पंचायत की आलोचना नहीं की और ज्ञापन स्वीकार किये गये। इसके बाद पहले से निश्चित हो चुकी नंगला मंदौड की पंचायत में भारी जन सैलाब उमडा जिसके उमडने का कारण सरकार द्वारा की गई एक पक्षीय कार्यवाही था। प्रशासकों ने उस वक्त इस पंचायत को गलत ठहराया परंतु इसे होने से रोकने में नाकामयाब रही और जिन लोगों को घटना से कोई संबंध भी न था उन पर मुकदमें दायर कर दिये गये या फिर उन्हें हिरासत में ले लिया गया - तब विरोध के बदले मिली तो लाठियां या फटकार उस वक्त इस घटना को शायद प्रदेश सरकार हल्के में ले रही थी या इन सबसे अपना बहुत बडा हित साधने का प्रयत्न किये जा रही थी। प्रयत्न में कोई कोर कसर रही भी नहीं जब इनकी गलत नीतियों के चलते पहले से व्याप्त दावानल की भांति फलने लगा और यह कांड एक महा सम्प्रदायिक रुप धारण करता चला गया। साथ ही जिस दिन बेरहमी से दो भाईयों का कत्ल किया गया उसके एक दिन बाद DM सुरेन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी का अचानक ही तबादला कर दिया गया जबकि वो घटना की तह तक पहुँचने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे और काफी हद तक स्थिति को काबू में करने का प्रयत्न में जारी था। परंतु उनके ऊपर गिरी तबादले की गाज ने उनके प्रयासों को विफल कर दिया। नये DM र एसएसपी साहब इस मामले को सही रुप में भांपने में ं असफल रहे, सरकार ने तब कोई सुंध नहीं ली। सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह जी जब अपने क्षेत्र की आसपास की छोटी घटनाओं के घटित होने पर उनकी सुध लेने के लिए, उनको दिलासा देने के लिए पीडितों के घर पर जाकर ढा़ंढस बंधा सकते है तो फिर कवाल कांड में ऐसा क्यों नहीं किया और न ही मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव जी ने इस मामले को गंभीरता से लिया। सरकार ने उस वक्त कोई ठोस कदम उठाने की कोशिश नहीं की। क्यूँ नहीं कि गयी ऐसी कोशिशें ? क्यूं हर बार इस घटना की जद में विपक्ष के नेताओं और निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी जारी रहीं। क्यूँ मात्र एक विशेष सम्प्रदाय के प्रेम में दूसरे सम्प्रदाय की भावनाओं से खिलवाड की गयी? क्यूँ सरकार उस वक्त पीडित परिवारों को मुआवजा मुहैया करा सकी? जब पानी सिर से ऊपर तैर गया तब सुध आयी सरकार को कि अब पैसा फेंको और तमाशा देखों। पर ये तमाशा सरकार को बहुत मंहगा पडने वाला है। साथ ही इस तमाशे में जनता के साथ विश्वासघात की तीव्र वेदना भी छिपी है। जनता ने क्या आपको चुनकर इस वक्त के लिए ताजपोशी की थी? क्या जनता को छलना ही सियासत का चलन है? ......सरकार पूरे तानाशाह की माफिक प्रदेश को चला रही है। दुर्गा शक्ति का निलंबन हो, या डीजीपी को मौत , और अब कवाल कांड पर सियासत .....इस सियासत के घिनौने खेल में कितनी लाशें बिछी सच मे ंइसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यदि सच देखा जाये तो अंकाडे मुंह तोड लेंगें और सच्चाई पे खुद पे रोने को मजबूर हो जायेगी। इतना घिनौना सच! अभी रविवार को प्रशासन ने अखबार बांटने पर रोक लगाई जो साबित करता है कि सरकार के नुमांइंदें अपनी करनी को छिपाने का हर संभव प्रयास करना चाहते है।
इस वक्त मुजफ्फरनगर जिले के अधिकांश कसबे, गांव , देहात इस नफरत की आग की चपेट में आ चुके हैं और फिलहाल ये आग बुझती नहीं दीख रही है। अभी फिलहाल में ही हुआ महापंचयत में जाने वाले लोगों पर हमला भी साजिश है ।कैसे एक धर्मस्थल में मौत का सामान पहुँच जाता है? ये सब सियासत को बेहद घिनौना खेल है। अभी तक सैंकडों लोग लापता है। लाशों को कोई हिसाब नहीं । जनता को गुमराह किया जा रहा है। साथ ही अफवाह का बाजार भी इन दिनों गर्म है। लोग सच्ची बात को तोड-मरोड कर पेश कर रहें हैं और इस तोड मरोड में साथ दे रहें है सरकारी नुमांइंदें। अब ये आग भीषणता से अपने पूरे विकराल रुप को धारण कर चुकी है जो बुझने को नाम नहीं ले रहीं। जगह जगह लगते कफ्र्यू और मौत का तांडव जारी है। सेना के दम पर तनावपूर्ण शंाति तो कहीं कहीं पसरी है पर दहशत और नफरत बरकरार है। सरकार हर मोड पे नाकामयाब साबित हुई और जनता को किसी न किसी तरह गुमराह करती रही। असल मुद्दों से ज्यादा तव्वजों दिया गया तो सिर्फ प्रदर्शन कार्यक्रमों को या वोट बैंक बढाने के हथकंडों को जिसका खामियाजा जनता भी भुगत रही है ...लाशेां पर लाशें गिर रहीं है और इंसान कहीं इन लाशों में दबा पूछ रहा है - मेरा वजूद क्या है? ’ वर्तमान में सियासत के ये घोर कृत्य जनता को बेगाना बना रहें है और भारत को आंतरिक रुप से कमजोर किये जा रहें है। सभी चाहते है कि इस क्या किसी भी प्रकरण की पूरी ईमानदारी के साथ निष्पक्ष जांच और कार्यवाही की जानी चाहिए परंतु अभी तक इस दौरान ऐसा होता नहीं दिखा। अभी भी एक पक्षीय कार्यवाही जारी है और जनता में आक्रोश व्याप्त है। दहशत और नफरत के बीच घिसटती जिंदगी में मौत का दाखिल होना और भी खौफनाक लगता है। पूरी पूरी रातें दहशत में जागते काट रहे लोग, अपराधी बन रहें है या बना दिये जा रहें है....मासूम खौफजदा है और किशोरों में नफरत का जहर घुलता जा रहा है....
सच्चाई बंया करने वाले लोगों को या तो जेल मिलती है या सजा-ए-मौत। पर सच्चाई छुप नहीं सकती !......ये समझ लेना चाहिए ३ण्ण्.अब  सरकार को समझ लेना चाहिए कि जिस जनता ने उसे चुनकर तख्त सौंपा है वह एक दिन इस तख्त को पलट भी सकती है- ‘‘ऐ खाक नशीनों उठ बैठों वक्त करीब आ पहुँचा है। जब तख्त गिराये जायेंगें और ताज उछाले जायेंगें।’’
-सत्येन्द्र कात्यायन , खतौली , मुज़फ्फरनगर 


सोमवार, 19 अगस्त 2013

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी


आजकल कद बढाने में कद्र को कम आंकते
कर्ज लेकर ही सही तन तो सजाना पडता है













है हवस की खोपडी, भरती नहीं है ये जनाब
दोस्त को भी कभी दुश्मन बनाना पडता है

गुमसुम जो बैठा हुआ है मूर्ति के सामने - मूरख वो!
इस जमाने में तो सबको मक्खन लगाना पडता है

जख्म गहरा हो, भर जायेगा इक न इक दिन
दिल के जख्मों को वक्त का साथ निभाना पडता है

छोडकर वो भीड में सामान अपना, चल दिए
कई मर्तबा जिन्दगी को जिन्दगी से बचाना पडता है

रुआंसा चेहरा लिए कोई बच्चा खडा है देर से
हाथ फैलाये , वो मंगता बना है
देखते हैं- देखकर मुंहफेर लेते है साहब
देखकर सब, रुलायी को मुंह छिपाना पडता है

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी
आदमियत को बचाने में जमाना लगता है

वजूद का जिक्र करते है बहुत लोग
वजूद में जिस्म औ’ शोहरत केा दिखाना पडता है

क्या करें शिकवा गिला, कुछ कर नहीं सकते हैं हम
‘सत्या’ इस जमाने में खुद को फंसाना पडता है


- सत्येन्द्र कात्यायन



सच और मौत..........................


मौत!... सच!, सच और मौत...दोनों एक सिक्के के दो पहलू। सिक्का - एक, पहलू दो। ‘जीवन’ का सफर, मौत - मंजिल। हिन्दूशास्त्र हो या विश्व का कोई ओर दर्शन सबने स्वीकारा है -मृत्यु को। यह मौत दबे पांव न जाने कब, किस वक्त, कैसे इंसान को, संपूर्ण सृष्टि को अपने शिकंजे में ले लेती है या यूं कहे आगोश में भर लेती है फिर वह उस जीव को इस कदर प्यार करती है, दुलारती है कि उसके आगोश से बाहर आ पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है, मौत- एक रहस्य!

एक ऐसा रहस्य जिसे जानने-समझने की कोशिश में हम खुद को इस सफर से उस सफर तक लादे फिरते है सिर्फ लादे और कुछ नहीं अंततः मौत हमें आगोश में ले ही लेती है और रहस्य मात्र एक रहस्य बना रहता है। एक भेद- जिसे भेदना असम्भव। दावे करने से कुछ नहीं होता, कुदरत की इस रोमांचकारी घटना में रद्दोबदल नहीं की जा सकती। मौत ही मनुष्य की वास्तविक प्रकृति है। बाकी सब - सारा जीवन मात्र एक ढकोसला। रंगमंच है- जीवन ।हम अपने अपने किरदार निभाकर अंत में अपनी वास्तविक प्रकृति में आ पाते हैं, हम प्रकृति में लीन हो जाते हैं। पाप-पुण्य- सब जीवन कर्मों में घुलकर रह जाता है, यथेष्ट फल भोगकर ही अंतिम यात्रा का टिकट मिलता है।
शिव को तीन रुपों - निर्माणकत्र्ता, पालनकत्र्ता, संहारकत्र्ता में परिभाषित किया जाता है, ये रुप विष्णु तुल्य हो या शिव तुल्य। सृष्टि चक्र में सम्मिलित है। विनाश के उपरांत- सृजनकी प्रक्रिया चिरस्थायी है। वाह्य लोक से अंतर्लोक की यात्रा - मात्र कहने भर से नहीं होती। योग का नाम मात्र लेने से ‘योगी’ नहीं बन जाते, भक्ति में बिना डूबे भगवत प्राप्ति नहीं होती, ज्ञान हेतु स्वयं का शोध - उतना ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए भोजन।
जीवन है तो मृत्यु भी है। मृत्यु है - इसलिए जीवन भी। आरोह- अवरोह का क्रम मात्र गणितीय प्रक्रम को ही प्रकट नहीं करते वरन् प्रकृति में भी ये क्रम पुनः पुनश्च चलता रहता है।
जब मृत्यु सत्य फिर जीवन। व्यर्थ! ...नहीं , सत्य प्राप्ति का साधन है। शरीर- जिससे जीवन की चलायमान प्रक्रिया जीवंत होती है। शरीर में आत्मा। आत्मा- जीवन। आत्मा जीव। जीव- जी रहा है, शरीर तो पहले ही मरा हुआ है, जीव प्रेरित करता है, शरीर एक इन्स्ट्रूमेंट की भांति मात्र कार्य करता है। विचार- मस्तिष्क का खेल। मस्तिष्क में आत्मतत्त्व होते हुए भी ग्राहकम क्षमता होती है- संासारिक ग्राहक। संसार के विभिन्न आयामों को ग्रहण कर मस्तिष्क उन्हें स्वयं के लिए स्वीकार्य/अस्वीकार्य करता है। जीव का भवन शरीर जहाँ रहता है वहीं से जुडती है उसकी लोकयात्रा के प्रारम्भिक चरण। जहाँ संगत/साथ/संग का स्पर्श या विचारों में कुलबुलाहट होती है। मिथ्या जगत के मिथ्या व्यवहार का असर इस अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मनुष्य के साथ ही ये सब होता है, हाँ, संगति का असर सब पर - जीवन के सफर/ यात्रा में अनेक छोटे-मोटे पडाव, बदलते संदर्भ, जिजीविषा में झटपटाता भाव-मनस, स्वयं में स्वयं की प्रतिछाया -प्रतीत होता है। जीवन-मार्ग पर चलकर, दुर्गम - सुगम, झाड-झंकाडों -उपवनों से गुजरकर अपने लक्ष्य की ओर बिना सोचे समझे बढता है- ‘मौत’ परम लक्ष्य है उसे भूलकर। ‘मौत’  स्वयं भुलावा देकर ‘जीव’ की यात्रा को विराम देती है, ये मात्रा एक लंबा पडाव है। विराम है। जीवन की समाप्ति नहीं। फिर से नये जीवन, नये संघर्ष के लिए - यह सब जरुरी ।
मैं यहाँ मौत की गुत्थी सुलझाने या उलझाने नहीं बैठा, न ही लंबा- चैडा मोक्षदायक प्रवचन देने के लिए। हाँ, कुछ हद तक प्रवचन जैसा जरुर है।
आज शव‘-यात्रा में शामिल हुआ। ‘ओइम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है’ के उद्घोष के साथ - शुरुआत हुई इस जुलूसकी।...श्मशान तक सब जनों के भाव में क्षणिक वैराग्य उत्पन्न हुआ। हम सभी पल भर में आत्मज्ञानी हो गये। अंतिम क्रिया के बाद वही दुनियावी काम-धंधे , छल-प्रपंच, दुखडा रोना, घर-गृहस्थी- सब पुराना टंटा वही राग...मोह की जकडन...संसार का गतिमान होना -बात एक ही है- विराम में संसार नहीं ...संसार में विराम नहीं...
-.सत्येन्द्र कात्यायन


भूली बिसरी बातें-----------1


भूली बिसरी बातें



प्रेम को शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। ये प्रेम मात्र लैला-मजनू वाला नहीं, कृष्ण-मीरा का नहीं, माँ-बेटे, भाई-बहन, प्रकृति से लगाव इत्यादिक हो सकता है।

06 दिसम्बर 2010 को तिस्सा गया। वहां से बाहर आने के लिए तांगे में बैइ और सवारियंा भी थी। पति-पत्नी भी, माँ-बेटियां भी थी, पोता-दादी थी। कई रिश्तों को ढोता हुआ तांगा चलने को था। दो लडकियाँ - गाँव की भोली-भाली छोरियाँ - अपनी माँ के साथ जा रही थी - तांगे में बैठी थी। अपने पापा को अपना शाॅल लेने घर भेजा। पिता साइकिल पर दौडता गया और शाॅल - दो शाॅल ले आया, बेटियाँ बातें कर रही थी- ‘ मम्मी, पापा का हमारे बिना जी नी लगने का, देख अब भी खडे़ है?, दूसरी बोली - ‘ मम्मी का बी कहाँ लगा तभी तो साथ चल दी, अब बाप जो खडा था उसकी आँखों में निर्मल प्यार का बहाव दिखा- भीगी थी उसकी आँखें। धोती कुर्ते पहने, गंजे सिर के अलावा बस उसकी आंखें थी जो भाव के इस निर्मल बहाव में गोते लगा रही थी। वपह तांगे वाले से थोडा खिंझाता,थोडा मुस्कराता सा बोला -‘ चल बे, तावली कर तांगे कू हांक। सवारी -ववारी बिठा तो ली, चलता बन अब।’ स्वयं वह पिता साइकिल को हाथ में थामें खडा रहा। उसकी एक बेटी ने उससे फिर कहा- ‘ पापाप, कपडे बदललियो, ’.. दूसरी ने कहा - ‘ खाना टाईम पे खाला करो’ । वो फिर भीगता हुआ सा बोला - ‘ ओये तावली कर, बढा आगे।’ एक बेटी फिर माँ से बोली - ‘ पापा से नवा शाल जो धोके रक्खा था, वो कहा था लाने कू, लियाए यो’ पिता साइकिल पर सवार होता से देखता रहा और बोला - ‘ ठीक है यू बी... जाओ।’ तांगा चल पडा, फिर से एक बेटी ने माँ से कहा - ‘पापा बिरान से हो जांगे, जी नी लगने का उनका म्हारे बिना, म्हारा बी नी लगने का...बाप खडा था अभी - तांगे को एकटक देख रहा था - मानो आज बेटियो की विदाई करके लौटेगा। और वह उन्हें शायद तब तक देखता रहा जब तक उसकी आंखो से वो तांगा ओझल नहीं हो गया।

मैंु ये सब दृश्य देख रहा था, मन ही मन सोच रहा था - बाप-बेटी के प्रेम की । कितना सच्चा, कितना निर्मल, कितना प्रगाढ प्रेम। परिवार इसी का नाम है। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना इसमें छिपा अनबोला प्रेम भाव।


-सत्येन्द्र कात्यायन . डायरी .............7 दिसम्बर 2010

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A