https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A
शब्दब्रह्म
शब्द ब्रह्म नाम इसलिए कि शब्द ब्रह्म/ परम सत्ता का स्वरुप है . इनका समुचित प्रयोग किया जाना चाहिए. शब्दों की अवहेलना करना उचित नहीं ..व्यक्ति की पूर्णता में शब्दों का बड़ा महत्व है..यह कभी कविता के रूप में तो कभी गद्य के रूप में प्रस्फूट हुआ..आज भी ये रूप समय के साथ अपने आप में यथोचित परिवर्तन के साथ स्वयं को जीवित रखे है ...ये मेरे अन्तस् के भाव है .. सब को सबके भावो से जुड़ने का अधिकार है. भावों में ही भावों का वरण होता है ... # सत्येन्द्र कात्यायन
सोमवार, 8 मार्च 2021
शनिवार, 13 फ़रवरी 2021
पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ
शब्दब्रह्म ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। आइये, आज हिन्दी भाषा में पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ के विषय में सामान्य जानकारी लेते हैं। इसके लिए मैंने व्याकरणाचार्य कामताप्रसाद गुरू जी, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. वासुदेवनंदन प्रसाद तथा डॉ. राघव प्रकाश जी की व्याकरण पुस्तकों का उपयोग किया है। आप इस ब्लॉग के माध्यम से आगे भी परीक्षापयोगी,ज्ञानोपयोगी तथा मेरी रचनाओं का आनंद लेते रहेंगे। आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?...कमेंट कर अवश्य बताइये। इस विषय पर सहजप्रवाह यू ट्यूब चैनल पर वीडियो भी अपलोड की गयी है। आप विडियों के माध्यम से भी सरलता से यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
सहज प्रवाह
संकलनकर्ता- सत्येन्द्र कात्यायन
आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?...कमेंट कर अवश्य बताइये। इस विषय पर सहजप्रवाह यू ट्यूब चैनल पर वीडियो भी अपलोड की गयी है। आप विडियों के माध्यम से भी सरलता से यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
धन्यवाद!
मंगलवार, 18 जुलाई 2017
चिंतन में चिंता...
साहित्य का बाज़ार होना कहाँ तक सही है?...संवेदना बिकाऊ हो तो वह हृदय तक कैसे पहुंचेगी ? ...आज का साहित्य जन जन का कब हो पायेगा?...बौद्धिकता ने तर्क दिए पर आस्था ग़ायब ? दिमाग शब्द जंजाल कब तक ढोयेगा?...क्या आज के साहित्य में विचारों की आज़ादी बची है या लीक को पीटा जा रहा है ?...आज का साहित्य समाज पर कितना असर डाल रहा है और समाज से कितना प्रभावित है? साहित्य के लिए समाज कितना बचा है? ..क्या साहित्य का समाज सिमटा है? ...साहित्य किसे माने?..किसी बड़े लेखक के लिखे को या किसी बड़े ओहदो से निकले शब्दों को या जन के मन को मथने वाले भाव को या जो कुछ लिखा कहीं भी लिखा उसको ? ....प्रश्न और भी होंगे आपके,मेरे हम सबके.....कृपया इन प्रश्नो पर विचार कर नए विचार से अवगत कराएं ..
# चिंतन में चिंता
-सत्येंद्र कात्यायन
मंगलवार, 27 जून 2017
प्रश्न ...
प्रश्न ?https://satyas138.blogspot.com
समय के चक्र में
उथला पड़ा सर्वस्व
सीखचों में जकड़ा पड़ा
दम्भ भर कर जी रहा
मानुषिक धरातल पर नाचता
स्वयं को करता गुमराह
आज तक अपरिचित
नगण्यता का उद्भूत दृष्टांत
अबूझ पहेली-सा
टकराहट के परिणाम को
करता चित्रित
बेलौस जल रहा
है कौन ? स्वयं से पूछियेगा ???
सोमवार, 30 जनवरी 2017
प्रियतम से मिलना मुझको है...
माँ शारदे नमोस्तुते...

दूर क्षितिज में ढूंढ रही हूँ
अपने अनजाने प्रियतम को
दूर क्षितिज को देख रही हूँ
पाने विस्तार स्वयं का
छाई घटाओ संग
खेल रहा चाँद लुका छुपी
दूर क्षितिज तक ले जायेगी
बहते बहते नाव किनारे
अम्बर का विस्तार
सागर की गहराई
लिए मन में
बाहें फ़ैलाने को तैयार
मेरा अनुपम उल्लास
बरसने को रिमझिम तैयार
राह दिखाता जलता दीपक
सजल अहसास बन परछाई बढ़ रहा
स्वयम स्वयं को तोल रहा
मैं बढ़ती जाती
नाविक मैं
दूर क्षितिज जाना मुझको है
बोल अबोले लेकर
प्रियतम से मिलना मुझको है...
@#सत्येंद्र कात्यायन
नज़र
नज़र पे कुछ भाव उमड़ आये ..👀 👀
👁 👁
नज़र नज़र से मिली
नज़र नज़र की बात थी
नज़र नज़र में खो गयी
नज़र नज़र की हो गयी
नज़र नज़र में डूबती
नज़र नज़र को चूमती
क्या खता नज़र ने की
नज़र में रौशनी का लुत्फ़
नज़र में सर्द धुंधलका
नज़र का लंबा फ़लसफ़ा
नज़र बहार औ' फ़िज़ा
नज़र की ये खुमारियां
नज़र नज़र में घुल गयी
नज़र नज़र चमक उठी
रौनको की झालरें
चमक उठा हृदय पटल
चमक उठा धरा गगन
चमक उठा शहर शहर
नगर नगर गांव गांव उठा चमक
चमक से झुक गयी नज़र
नज़र की लग गयी नज़र
🙏🙏✍🏻
सत्येंद्र कात्यायन
अकविता
https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A




