किशोर बसंत, सर्द हवाओं का बहना कुछ कम, सूर्य किरणों का अद्भुत खेल एवं सुनहरी छटा, पक्षियों का मुक्तकंठ गान... दुनियां केे मंच को नवीनता और रोमांच से उन्मादित करता हुआ आया -बसंत। एक रुमानी नशा चारों ओर फिजाओं में छा रहा है। हर दिल कवि बनना चाहता है। कोई कुछ कहें या न कहे प्रकृति का सुन्दर मुख सब कुछ वर्णित करने में समर्थ है। प्रकृति में नया ओज, नयी क्रांति, नयी उमंग, नयी लय, नयी लहर, नया जोश, नया वासंती रंग चहुं ओर बिखरा सा यही संदेश देता है -
ढककर स्वयं को इस लिबास में
बढते जाना है आगे
आत्मिक सुख के अवसर है
आ बढ़ कुछ आगे तो बढ
मन को नेह का पठ सीखाने
तन की दुति कोमलता को जगाने
पापभाव से निकल जरा देख
अम्बर तल छू रहा धरा को
हे मानव! सुन भोर हुई है
लालिमा बिखेर रहा सूर्य
संध्या की मधुरिम झांकी
देखने को भोर में चल
चल बढ आगे
तेरा मन स्थिर न हो
वासंती चोला हो न हो
वासंती संग प्रकृति हो
स्वयं को वासंती रंग में रंग
प्रकृति में संगीत की अनुपम छटा बिखरती है- पक्षी कलरव कर करके संगीत की लय, गति, आरोह-अवरोह को व्यंजित करने से से नहीं चूकते। इस नव विहान में प्रकृति में होता आया -एक बडा, विशाल, विराट परिवर्तन जिसमें उल्लास है, उमंग है, चेतना है और पथ की कंटकता के प्रति विद्रोह हैै।
वृक्ष झूमते हुए न जाने किस बोली, किस भाषा में कुछ गाते हुए हमें सिखाते हैं। अविराम विकसन प्रक्रिया का प्रक्रम। पतझर में ठंूठ बना वृक्ष आशाओं के नवीन पत्रों से लदा होता है। कुछ इस तरह -
हारना आता नहीं
ठूंठ तो मैं बन चुका हूँ
पर नहीं थकित
अस्तित्व मेरा
अस्तत्व मेरा कभी न मिटेगा
राख भी हो जाऊँ
तब भी नहीं
मैं बहूँगा वायु के संग
जल के भीतर
पृथ्वी के कण-कण से चिपका रहूँगा
मैं नहीं हारा
संघर्ष करता रहा
निरंतर बढता रहा
हे बसंत करता नमन तुझे
तूने दिया नव जीवन मुझे
कह रहा हूँ-भाव अपने
पांखुरी से गीत सुनाता चला
हाँ! मैं हुआ फिर से भरा
पर मैं न हारा था न हारा हूँ
मैं बढ रहा हूँ
उत्थान -पतन के भय से विलग हो
पृथ्वी पर स्थित नभ चुम्बित पर्वत-अटल, अचल सिद्धांतों को और भी दृढ़-दृढेत्तर बनाने के लिए संदेश देते हैं। प्रकृति का कण-कण उल्लासित, कण-कण में नवीन चेतना प्रस्फुटित होती है- आया बसंत।
-सत्येन्द्र कात्यायन, एम0ए0(हिन्दी, शिक्षाशास्त्र) , बी.एड.,नेट(हिन्दी), शोधार्थी(हिंदी)

