शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

आया बसंत.....


किशोर बसंत, सर्द हवाओं का बहना कुछ कम, सूर्य किरणों का अद्भुत खेल एवं सुनहरी छटा, पक्षियों का मुक्तकंठ गान... दुनियां केे मंच को नवीनता और रोमांच से उन्मादित करता हुआ आया -बसंत। एक रुमानी नशा चारों ओर फिजाओं में छा रहा है। हर दिल कवि बनना चाहता है। कोई कुछ कहें या न कहे प्रकृति का सुन्दर मुख सब कुछ वर्णित करने में समर्थ है। प्रकृति में नया ओज, नयी क्रांति, नयी उमंग, नयी लय, नयी लहर, नया जोश, नया वासंती रंग चहुं ओर बिखरा सा यही संदेश देता है -

ढककर स्वयं को इस लिबास में
बढते जाना है आगे
आत्मिक सुख के अवसर है
आ बढ़ कुछ आगे तो बढ
मन को नेह का पठ  सीखाने
तन की दुति कोमलता को जगाने
पापभाव से निकल जरा देख
अम्बर तल छू रहा धरा को
हे मानव! सुन भोर हुई है
लालिमा बिखेर रहा सूर्य
संध्या की मधुरिम झांकी
देखने को भोर में चल
चल बढ आगे
तेरा मन स्थिर न हो
वासंती चोला हो न हो
वासंती संग प्रकृति हो
स्वयं को वासंती रंग में रंग


प्रकृति में संगीत की अनुपम छटा बिखरती है- पक्षी कलरव कर करके संगीत की लय, गति, आरोह-अवरोह को व्यंजित करने से से नहीं चूकते। इस नव विहान में प्रकृति में होता आया -एक बडा, विशाल, विराट परिवर्तन जिसमें उल्लास है, उमंग है, चेतना है और पथ की कंटकता के प्रति विद्रोह हैै।
वृक्ष झूमते हुए न जाने किस बोली, किस भाषा में कुछ गाते हुए हमें सिखाते हैं। अविराम विकसन प्रक्रिया का प्रक्रम। पतझर में ठंूठ बना वृक्ष आशाओं के नवीन पत्रों से लदा होता है। कुछ इस तरह -

हारना आता नहीं
ठूंठ तो मैं बन चुका हूँ
पर नहीं थकित
अस्तित्व मेरा
अस्तत्व मेरा कभी न मिटेगा
राख भी हो जाऊँ
तब भी नहीं
मैं बहूँगा वायु के संग
जल के भीतर
पृथ्वी के कण-कण से चिपका रहूँगा
मैं नहीं हारा
संघर्ष करता रहा
निरंतर बढता रहा
हे बसंत करता नमन तुझे
तूने दिया नव जीवन मुझे
कह रहा हूँ-भाव अपने
पांखुरी से गीत सुनाता चला
हाँ! मैं हुआ फिर से भरा
पर मैं न हारा था न हारा हूँ
मैं बढ रहा हूँ
उत्थान -पतन के भय से विलग हो


पृथ्वी पर स्थित नभ चुम्बित पर्वत-अटल, अचल सिद्धांतों को और भी दृढ़-दृढेत्तर बनाने के लिए संदेश देते हैं। प्रकृति का कण-कण उल्लासित, कण-कण में नवीन चेतना प्रस्फुटित होती है- आया बसंत।




-सत्येन्द्र कात्यायन, एम0ए0(हिन्दी, शिक्षाशास्त्र) , बी.एड.,नेट(हिन्दी), शोधार्थी(हिंदी)

हम और हमारा राजतंत्र



विचार की गहन उथल-पुथल दिमाग को मथ रही है.........

वर्तमान में देश भर में पूंजीपति भरे पडे हैं। ऐसे-ऐसे धनाढ्य जो विश्वस्तर पर अद्वितीय स्थान बनाये है परंतु लगता है इन सबों का अधिक ध्यान देश की तरफ कम रहता है विश्व बाजार की तरफ अधिक। कम्पनियों की जो समस्या फिलवक्त बढ रही है उसमें तो सम्पूर्ण योग यहाँ के राजनेताओं का ही है जो किसी न किसी रुप में कम्पनियों से मुनाफा खाना चाहते है, बनाना चाहते है। उनके एजेण्ट बने हुए है -प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से। विदेशी कम्पनियों का भला करने में जुटा हुआ है प्रत्येक राजनेता- किसी न किसी रुप में  और स्वदेशी कम्पनियो ंके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता रहा हैै। विदेशी कम्पनियों ने पहले भी बाजार पर बेहद मजबूत पकड बना रखी है, सब इसकारण की उन्हें यहाँ के बजार में अपना माल बेचने की खुली छूट दी जाती रही और इसी का परिणाम ये है कि आज एक आम नागरिक भी विदेशी कम्पनियों के प्रति श्रद्धा रखता है -उसके परिणाम को बिना जाने। उन्हें ये तक पता नहीं होता कि जिन कम्पनियों का हम माल खरीद रहें है उसका लाभ देश को नही ंके बराबर हो रहा है और विदेशों में हमारा धन अनायास ही जा रहा है। यह सब देश के लिए घातक है। स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और पुनः हम गुलाम होने की कगार पर पहुँचते जा रहे हैं। अपनी पिछली गलतियो ंसे कोई सीख नहीं ले रहें। हमारे देश में आज एक से एक बढकर निर्माता है और जिनमें गुणवत्ता भी और दाम भी विदेशी कम्पनियों के मुकाबले बेहद कम। हमारी सरकार उन स्वदेशी कम्पनियों को मौके देना ही नहीं चाहती और वर्षो से यही होता रहा है कि भारत जैसे समृद्धशाली देश में विदेशी कम्पनियां आकर यहाँ की स्वदेशी कम्पनियों को टेकओवर करती है -ये सब होता है हमारे लचीले कानून के कारण। कानून इतना लचीला रहा है कि ये कम्पनियां बिना किसी भय के अपने पैर जमाती जाती है जिसमें इन्हें टैक्स आदि की भी भरपूर छूट दी जा रही है। सभी राज्यों में विदेशी कम्पनियों की बाढ आ रही है। अब इसे स्वार्थ की राजनीति ही कहा जायेगा। सरकार की स्वार्थी नीतियों के कारण सब गुड गोबर हो रहा है। आज दलगत राजनीति के साथ साथ स्वार्थ परक राजनीति चल पडी है जिससे देश का भला होने वाला नहीं।
विदेशी व्यक्ति और विदेशी सामान के प्रति भारतीयों का लगाव प्रारंभ से ही रहा है। हम विदेशी सामान रखने में अपनी शान समझते है बल्कि जो चीजें हमारा देश निर्यात करता है यदि वो भी हमें विदेशी प्राप्त हो जाये तो हमेे अपार संतोष होता है और स्वयं को सम्मानित महसूस करते है कि मेरे पास ये विदेशी वस्तु है परंतु यदि गौर करें तो यह देश के साथ गद्दारी है जो हम करोडों भारतीय अनायास ही कर बैठते है और जान भी नहीं पाते कि हमने अपने देश के कितने हजार करोडों को मुनाफा विदेशियो ंके हवाले कर दिया । इसमें मुख्य दोषी के रुप में तो सरकार ही है जो आमंत्रित करती है विदेशी कम्पनियों को अपने देश में व्यापार के लिए। व्यापार के लिए आमंत्रित करें, अच्छी बात, पर लूट के लिए आमंत्रित करें ये तो सरासर गद्दारी हुई। नियमों और शर्तों में ढील बल्कि विदेशी हित को ध्यान में रखकर ही बनायी जाती है - अधिकांश व्यापारिक नीतियां जो घातक सिद्ध होती है देश के लिए।
ये हमारा लोकतंत्र लोकतंत्र कम राजतंत्र ही ज्यादा दिखता है जहाँ पर कुर्सी प्राप्त करने के उपरांत जनता को ठेंगा दिखाया जाता है। भोली भाली जनता ये भी नहीं समझ पाती कि ठेंगा क्यूं दिखायी देता है? जिसमें देश को चलाने वाले स्वयं को चलाने में ही विश्वास रखते हैं। स्वयं के कल्याण में उनका विश्वास देखने लायक है फिर बात ठीक भी है- स्वार्थी व्यक्ति देश को कोडियों के भाव बेच सकता है यदि उसकी स्वार्थ पूर्ति होती है तो। ऐसा ही हुआ है- भारत के इतिहास में बार-बार। कितनी बार स्वार्थियों ने, गद्दारों ने देश को गुलाम बनवाया । कितनी बार लूटे हम, .....हर बार लुटकर भी हम आकर्षित हुए विदेशी लोगों की तरफ। हमारा कानून -देश के राजनेताओं की दिमागी उपज बना जिसमें अधिकतर नियम उधार लिए हुए है- विदेशों से। हमारे राजनेताओं के लिए तो धन सर्वोपरी है और देश की मान प्रतिष्ठा से उन्हें शायद कोई लेना देना ही नही। अपने मान सम्मान के सपने देखने वाला देश की प्रतिष्ठा को कब दांव पर लगा बैठे, कुछ नहीं कहा जा सकता। देश की जनता को गुमराह करने के अनेक तरीके ईजाद करते है -राजनेता। जिनमें लुभावनी योजनाएँ होती है पर उन्हें कागजी पुलिंदों में ही बंधा रहने दिया जाता है और प्रचार किया जाता है बढा चढा कर । अमलीजामा तो कभी योजनाओं को पहनाया नहीं जाता और यदि कुछेक को पहना भी दिया जाता है तो वो जामा अधिक दिनों तक चल नहीं पाता और या तो सरकार बदलने पर योजनाएँ बदल जाती है या फिर योजनाओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है, उनका लाभ भी किसी न किसी रुप में राजनेताओं को मिल ही जाता है और कुछ खास नागरिकों को जो नेताओं के विश्वास पात्र होतें है। आम आदमी देखता है, बस देखता है। स्वयं को लूटते हुए, देश को लूटते हुए।

-सत्येन्द्र कात्यायन 

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A