भूली बिसरी बातें
प्रेम को शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। ये प्रेम मात्र लैला-मजनू वाला नहीं, कृष्ण-मीरा का नहीं, माँ-बेटे, भाई-बहन, प्रकृति से लगाव इत्यादिक हो सकता है।
06 दिसम्बर 2010 को तिस्सा गया। वहां से बाहर आने के लिए तांगे में बैइ और सवारियंा भी थी। पति-पत्नी भी, माँ-बेटियां भी थी, पोता-दादी थी। कई रिश्तों को ढोता हुआ तांगा चलने को था। दो लडकियाँ - गाँव की भोली-भाली छोरियाँ - अपनी माँ के साथ जा रही थी - तांगे में बैठी थी। अपने पापा को अपना शाॅल लेने घर भेजा। पिता साइकिल पर दौडता गया और शाॅल - दो शाॅल ले आया, बेटियाँ बातें कर रही थी- ‘ मम्मी, पापा का हमारे बिना जी नी लगने का, देख अब भी खडे़ है?, दूसरी बोली - ‘ मम्मी का बी कहाँ लगा तभी तो साथ चल दी, अब बाप जो खडा था उसकी आँखों में निर्मल प्यार का बहाव दिखा- भीगी थी उसकी आँखें। धोती कुर्ते पहने, गंजे सिर के अलावा बस उसकी आंखें थी जो भाव के इस निर्मल बहाव में गोते लगा रही थी। वपह तांगे वाले से थोडा खिंझाता,थोडा मुस्कराता सा बोला -‘ चल बे, तावली कर तांगे कू हांक। सवारी -ववारी बिठा तो ली, चलता बन अब।’ स्वयं वह पिता साइकिल को हाथ में थामें खडा रहा। उसकी एक बेटी ने उससे फिर कहा- ‘ पापाप, कपडे बदललियो, ’.. दूसरी ने कहा - ‘ खाना टाईम पे खाला करो’ । वो फिर भीगता हुआ सा बोला - ‘ ओये तावली कर, बढा आगे।’ एक बेटी फिर माँ से बोली - ‘ पापा से नवा शाल जो धोके रक्खा था, वो कहा था लाने कू, लियाए यो’ पिता साइकिल पर सवार होता से देखता रहा और बोला - ‘ ठीक है यू बी... जाओ।’ तांगा चल पडा, फिर से एक बेटी ने माँ से कहा - ‘पापा बिरान से हो जांगे, जी नी लगने का उनका म्हारे बिना, म्हारा बी नी लगने का...बाप खडा था अभी - तांगे को एकटक देख रहा था - मानो आज बेटियो की विदाई करके लौटेगा। और वह उन्हें शायद तब तक देखता रहा जब तक उसकी आंखो से वो तांगा ओझल नहीं हो गया।
मैंु ये सब दृश्य देख रहा था, मन ही मन सोच रहा था - बाप-बेटी के प्रेम की । कितना सच्चा, कितना निर्मल, कितना प्रगाढ प्रेम। परिवार इसी का नाम है। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना इसमें छिपा अनबोला प्रेम भाव।
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सत्येन्द्र कात्यायन . डायरी .............7 दिसम्बर 2010