सोमवार, 19 अगस्त 2013

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी


आजकल कद बढाने में कद्र को कम आंकते
कर्ज लेकर ही सही तन तो सजाना पडता है













है हवस की खोपडी, भरती नहीं है ये जनाब
दोस्त को भी कभी दुश्मन बनाना पडता है

गुमसुम जो बैठा हुआ है मूर्ति के सामने - मूरख वो!
इस जमाने में तो सबको मक्खन लगाना पडता है

जख्म गहरा हो, भर जायेगा इक न इक दिन
दिल के जख्मों को वक्त का साथ निभाना पडता है

छोडकर वो भीड में सामान अपना, चल दिए
कई मर्तबा जिन्दगी को जिन्दगी से बचाना पडता है

रुआंसा चेहरा लिए कोई बच्चा खडा है देर से
हाथ फैलाये , वो मंगता बना है
देखते हैं- देखकर मुंहफेर लेते है साहब
देखकर सब, रुलायी को मुंह छिपाना पडता है

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी
आदमियत को बचाने में जमाना लगता है

वजूद का जिक्र करते है बहुत लोग
वजूद में जिस्म औ’ शोहरत केा दिखाना पडता है

क्या करें शिकवा गिला, कुछ कर नहीं सकते हैं हम
‘सत्या’ इस जमाने में खुद को फंसाना पडता है


- सत्येन्द्र कात्यायन



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अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A