सोमवार, 30 जनवरी 2017

प्रियतम से मिलना मुझको है...

माँ शारदे नमोस्तुते...


दूर क्षितिज में ढूंढ रही हूँ
अपने अनजाने प्रियतम को
दूर क्षितिज को देख रही हूँ
पाने विस्तार स्वयं का
छाई घटाओ संग
खेल रहा चाँद लुका छुपी
दूर क्षितिज तक ले जायेगी
बहते बहते नाव किनारे
अम्बर का विस्तार
सागर की गहराई
लिए मन में
बाहें फ़ैलाने को तैयार
मेरा अनुपम उल्लास
बरसने को रिमझिम तैयार
राह दिखाता जलता दीपक
सजल अहसास बन परछाई बढ़ रहा
स्वयम स्वयं को तोल रहा
मैं बढ़ती जाती
नाविक मैं
दूर क्षितिज जाना मुझको है
बोल अबोले लेकर
प्रियतम से मिलना मुझको है...

@#सत्येंद्र कात्यायन

नज़र



नज़र पे कुछ भाव उमड़ आये ..👀  👀



👁    👁





नज़र नज़र से मिली
नज़र नज़र की बात थी
नज़र नज़र में खो गयी
नज़र नज़र की हो गयी
नज़र नज़र में डूबती
नज़र नज़र को चूमती
क्या खता नज़र ने की

नज़र में रौशनी का लुत्फ़
नज़र में सर्द धुंधलका
नज़र का लंबा फ़लसफ़ा
नज़र बहार औ' फ़िज़ा
नज़र की ये खुमारियां
नज़र नज़र में घुल गयी
नज़र नज़र चमक उठी

रौनको की झालरें
चमक उठा हृदय पटल
चमक उठा धरा गगन
चमक उठा शहर शहर
नगर नगर गांव गांव उठा चमक
चमक से झुक गयी नज़र
नज़र की लग गयी नज़र
🙏🙏✍🏻
सत्येंद्र कात्यायन

कुछ दोहे ...नेतन , जनता, वोट

टोपी का उपयोग अब, नेता की पहचान।
कुरता भी अब बन गया, नेता जी की शान।।

टोपी हाथी पर चढ़ी, कहीं साइकिल संग।
हाथ हिलाती चल रही, टोपी बनी दबंग।।

नेता मूरख बनाते, जनता को हर बार।
जान बावले बन रहे, देख वोट अधिकार।।

वादों की बातें चली, हाँ सपनों की बात।
दूर दूर पहुँच सपन, बस में रही न बात।।

मोटे मोटे पेट भी, दौड़ लगाते आज।
किस्से और कहानियां, निभा रही है साथ।।

लूटा जनता को बहुत, अब जनता की बार।
देर सबेर ना कीजिए, मत है एक हथियार।।

🇮🇳👆✍🏻सत्येंद्र कात्यायन

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A