रविवार, 15 सितंबर 2013

ऐ खाक नशीनों उठ बैठों...लेख

ऐ खाक नशीनों उठ बैठों...

अखिलेश सरकार की दोषपूर्ण नीतियाँ और फिलवक्त जारी एकपक्षीय कार्यवाहीं से साफ जाहिर होता है कि यह सरकार मात्र एक विश्ैाष सम्प्रदाय के मोह में , कुर्सी के लोभ में सियासी दांव पेंच खेल रही है जिसमें बेचारी बेगुनाह जनता पिस रही है और हर तरफ नफरत का जहर फैला है। इन सब की जिम्मेदार सरकार की गलत नीतियाँ ही हैं और अब सरकार अपनी गलती में कोई सुधार करने के बजाय , अपनी गलती को स्वीकार करने के बजाय इन सब घटनाओं को विपक्ष की करतूत बता रही हैं। सियासत में इस तरह का खेल पहले कभी नहीं खेला गया परंतु अब सियासत का घिनौना चेहरा सभी के सामने है जरुरत है उसे पहचानने की। सरकार को ये जान लेना चाहिए की ये दांव उस पर बहुत भारी पडने वाला है। सरकार जनता के शोषण पर तूली है। हर जगह नफरत की आग फैलायी जा रही है जो सरकार के नाकामयाब होने का सबूत है ।-
मुज़फ्फरनगर में भडके कवाल कांड को तूल दिया सियासत ने और सरकार की एक पक्षीय कार्यवाही ने। अखिलेश सरकार एक तरफ तो लैपटाप का वितरण करने में मशगूल है तो दूसरी तरफ लोगो में नफरत का जहर घोलने में भी कोई कोर कसर इस सरकार के नुमांइंदों ने नहीं छोडा है।
मुज़फ्फरनगर के जानसठ कस्बे के कवाल में हुए बेरहम कांड के बाद बवाल मचा। बवाल शायद ज्यादा दिन ठहर नहीं पाता परंतु जब सियासत की रोटियाँ सिकनें लगी तो इसकी आग बेतरतीब बढती चली गया और आलम ये है कि 27 अगस्त को घटी ये घटना आज भी सियासी जंग बनी हुई है और भिड रहें है इंसान इंसानों से । 
सरकार अब अपनी गलती स्वीकार करने में हिचक रही है। सब जानते है कि सपा के शासन काल में गुंडा राज पनपता है और वो गुंडा राज आम जनता का चैन -शुकून छीन लेता है। घटना के बाद जुमे के दिन हुई पंचायत/सभा ने इसे नया मोड दिया इसी सभा में ज्ञापन भी सौंपे गये , तब तो प्रशासकों ने ऐसी पंचायत की आलोचना नहीं की और ज्ञापन स्वीकार किये गये। इसके बाद पहले से निश्चित हो चुकी नंगला मंदौड की पंचायत में भारी जन सैलाब उमडा जिसके उमडने का कारण सरकार द्वारा की गई एक पक्षीय कार्यवाही था। प्रशासकों ने उस वक्त इस पंचायत को गलत ठहराया परंतु इसे होने से रोकने में नाकामयाब रही और जिन लोगों को घटना से कोई संबंध भी न था उन पर मुकदमें दायर कर दिये गये या फिर उन्हें हिरासत में ले लिया गया - तब विरोध के बदले मिली तो लाठियां या फटकार उस वक्त इस घटना को शायद प्रदेश सरकार हल्के में ले रही थी या इन सबसे अपना बहुत बडा हित साधने का प्रयत्न किये जा रही थी। प्रयत्न में कोई कोर कसर रही भी नहीं जब इनकी गलत नीतियों के चलते पहले से व्याप्त दावानल की भांति फलने लगा और यह कांड एक महा सम्प्रदायिक रुप धारण करता चला गया। साथ ही जिस दिन बेरहमी से दो भाईयों का कत्ल किया गया उसके एक दिन बाद DM सुरेन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी का अचानक ही तबादला कर दिया गया जबकि वो घटना की तह तक पहुँचने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे और काफी हद तक स्थिति को काबू में करने का प्रयत्न में जारी था। परंतु उनके ऊपर गिरी तबादले की गाज ने उनके प्रयासों को विफल कर दिया। नये DM र एसएसपी साहब इस मामले को सही रुप में भांपने में ं असफल रहे, सरकार ने तब कोई सुंध नहीं ली। सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह जी जब अपने क्षेत्र की आसपास की छोटी घटनाओं के घटित होने पर उनकी सुध लेने के लिए, उनको दिलासा देने के लिए पीडितों के घर पर जाकर ढा़ंढस बंधा सकते है तो फिर कवाल कांड में ऐसा क्यों नहीं किया और न ही मुख्यमंत्राी अखिलेश यादव जी ने इस मामले को गंभीरता से लिया। सरकार ने उस वक्त कोई ठोस कदम उठाने की कोशिश नहीं की। क्यूँ नहीं कि गयी ऐसी कोशिशें ? क्यूं हर बार इस घटना की जद में विपक्ष के नेताओं और निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी जारी रहीं। क्यूँ मात्र एक विशेष सम्प्रदाय के प्रेम में दूसरे सम्प्रदाय की भावनाओं से खिलवाड की गयी? क्यूँ सरकार उस वक्त पीडित परिवारों को मुआवजा मुहैया करा सकी? जब पानी सिर से ऊपर तैर गया तब सुध आयी सरकार को कि अब पैसा फेंको और तमाशा देखों। पर ये तमाशा सरकार को बहुत मंहगा पडने वाला है। साथ ही इस तमाशे में जनता के साथ विश्वासघात की तीव्र वेदना भी छिपी है। जनता ने क्या आपको चुनकर इस वक्त के लिए ताजपोशी की थी? क्या जनता को छलना ही सियासत का चलन है? ......सरकार पूरे तानाशाह की माफिक प्रदेश को चला रही है। दुर्गा शक्ति का निलंबन हो, या डीजीपी को मौत , और अब कवाल कांड पर सियासत .....इस सियासत के घिनौने खेल में कितनी लाशें बिछी सच मे ंइसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यदि सच देखा जाये तो अंकाडे मुंह तोड लेंगें और सच्चाई पे खुद पे रोने को मजबूर हो जायेगी। इतना घिनौना सच! अभी रविवार को प्रशासन ने अखबार बांटने पर रोक लगाई जो साबित करता है कि सरकार के नुमांइंदें अपनी करनी को छिपाने का हर संभव प्रयास करना चाहते है।
इस वक्त मुजफ्फरनगर जिले के अधिकांश कसबे, गांव , देहात इस नफरत की आग की चपेट में आ चुके हैं और फिलहाल ये आग बुझती नहीं दीख रही है। अभी फिलहाल में ही हुआ महापंचयत में जाने वाले लोगों पर हमला भी साजिश है ।कैसे एक धर्मस्थल में मौत का सामान पहुँच जाता है? ये सब सियासत को बेहद घिनौना खेल है। अभी तक सैंकडों लोग लापता है। लाशों को कोई हिसाब नहीं । जनता को गुमराह किया जा रहा है। साथ ही अफवाह का बाजार भी इन दिनों गर्म है। लोग सच्ची बात को तोड-मरोड कर पेश कर रहें हैं और इस तोड मरोड में साथ दे रहें है सरकारी नुमांइंदें। अब ये आग भीषणता से अपने पूरे विकराल रुप को धारण कर चुकी है जो बुझने को नाम नहीं ले रहीं। जगह जगह लगते कफ्र्यू और मौत का तांडव जारी है। सेना के दम पर तनावपूर्ण शंाति तो कहीं कहीं पसरी है पर दहशत और नफरत बरकरार है। सरकार हर मोड पे नाकामयाब साबित हुई और जनता को किसी न किसी तरह गुमराह करती रही। असल मुद्दों से ज्यादा तव्वजों दिया गया तो सिर्फ प्रदर्शन कार्यक्रमों को या वोट बैंक बढाने के हथकंडों को जिसका खामियाजा जनता भी भुगत रही है ...लाशेां पर लाशें गिर रहीं है और इंसान कहीं इन लाशों में दबा पूछ रहा है - मेरा वजूद क्या है? ’ वर्तमान में सियासत के ये घोर कृत्य जनता को बेगाना बना रहें है और भारत को आंतरिक रुप से कमजोर किये जा रहें है। सभी चाहते है कि इस क्या किसी भी प्रकरण की पूरी ईमानदारी के साथ निष्पक्ष जांच और कार्यवाही की जानी चाहिए परंतु अभी तक इस दौरान ऐसा होता नहीं दिखा। अभी भी एक पक्षीय कार्यवाही जारी है और जनता में आक्रोश व्याप्त है। दहशत और नफरत के बीच घिसटती जिंदगी में मौत का दाखिल होना और भी खौफनाक लगता है। पूरी पूरी रातें दहशत में जागते काट रहे लोग, अपराधी बन रहें है या बना दिये जा रहें है....मासूम खौफजदा है और किशोरों में नफरत का जहर घुलता जा रहा है....
सच्चाई बंया करने वाले लोगों को या तो जेल मिलती है या सजा-ए-मौत। पर सच्चाई छुप नहीं सकती !......ये समझ लेना चाहिए ३ण्ण्.अब  सरकार को समझ लेना चाहिए कि जिस जनता ने उसे चुनकर तख्त सौंपा है वह एक दिन इस तख्त को पलट भी सकती है- ‘‘ऐ खाक नशीनों उठ बैठों वक्त करीब आ पहुँचा है। जब तख्त गिराये जायेंगें और ताज उछाले जायेंगें।’’
-सत्येन्द्र कात्यायन , खतौली , मुज़फ्फरनगर 


सोमवार, 19 अगस्त 2013

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी


आजकल कद बढाने में कद्र को कम आंकते
कर्ज लेकर ही सही तन तो सजाना पडता है













है हवस की खोपडी, भरती नहीं है ये जनाब
दोस्त को भी कभी दुश्मन बनाना पडता है

गुमसुम जो बैठा हुआ है मूर्ति के सामने - मूरख वो!
इस जमाने में तो सबको मक्खन लगाना पडता है

जख्म गहरा हो, भर जायेगा इक न इक दिन
दिल के जख्मों को वक्त का साथ निभाना पडता है

छोडकर वो भीड में सामान अपना, चल दिए
कई मर्तबा जिन्दगी को जिन्दगी से बचाना पडता है

रुआंसा चेहरा लिए कोई बच्चा खडा है देर से
हाथ फैलाये , वो मंगता बना है
देखते हैं- देखकर मुंहफेर लेते है साहब
देखकर सब, रुलायी को मुंह छिपाना पडता है

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी
आदमियत को बचाने में जमाना लगता है

वजूद का जिक्र करते है बहुत लोग
वजूद में जिस्म औ’ शोहरत केा दिखाना पडता है

क्या करें शिकवा गिला, कुछ कर नहीं सकते हैं हम
‘सत्या’ इस जमाने में खुद को फंसाना पडता है


- सत्येन्द्र कात्यायन



सच और मौत..........................


मौत!... सच!, सच और मौत...दोनों एक सिक्के के दो पहलू। सिक्का - एक, पहलू दो। ‘जीवन’ का सफर, मौत - मंजिल। हिन्दूशास्त्र हो या विश्व का कोई ओर दर्शन सबने स्वीकारा है -मृत्यु को। यह मौत दबे पांव न जाने कब, किस वक्त, कैसे इंसान को, संपूर्ण सृष्टि को अपने शिकंजे में ले लेती है या यूं कहे आगोश में भर लेती है फिर वह उस जीव को इस कदर प्यार करती है, दुलारती है कि उसके आगोश से बाहर आ पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है, मौत- एक रहस्य!

एक ऐसा रहस्य जिसे जानने-समझने की कोशिश में हम खुद को इस सफर से उस सफर तक लादे फिरते है सिर्फ लादे और कुछ नहीं अंततः मौत हमें आगोश में ले ही लेती है और रहस्य मात्र एक रहस्य बना रहता है। एक भेद- जिसे भेदना असम्भव। दावे करने से कुछ नहीं होता, कुदरत की इस रोमांचकारी घटना में रद्दोबदल नहीं की जा सकती। मौत ही मनुष्य की वास्तविक प्रकृति है। बाकी सब - सारा जीवन मात्र एक ढकोसला। रंगमंच है- जीवन ।हम अपने अपने किरदार निभाकर अंत में अपनी वास्तविक प्रकृति में आ पाते हैं, हम प्रकृति में लीन हो जाते हैं। पाप-पुण्य- सब जीवन कर्मों में घुलकर रह जाता है, यथेष्ट फल भोगकर ही अंतिम यात्रा का टिकट मिलता है।
शिव को तीन रुपों - निर्माणकत्र्ता, पालनकत्र्ता, संहारकत्र्ता में परिभाषित किया जाता है, ये रुप विष्णु तुल्य हो या शिव तुल्य। सृष्टि चक्र में सम्मिलित है। विनाश के उपरांत- सृजनकी प्रक्रिया चिरस्थायी है। वाह्य लोक से अंतर्लोक की यात्रा - मात्र कहने भर से नहीं होती। योग का नाम मात्र लेने से ‘योगी’ नहीं बन जाते, भक्ति में बिना डूबे भगवत प्राप्ति नहीं होती, ज्ञान हेतु स्वयं का शोध - उतना ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए भोजन।
जीवन है तो मृत्यु भी है। मृत्यु है - इसलिए जीवन भी। आरोह- अवरोह का क्रम मात्र गणितीय प्रक्रम को ही प्रकट नहीं करते वरन् प्रकृति में भी ये क्रम पुनः पुनश्च चलता रहता है।
जब मृत्यु सत्य फिर जीवन। व्यर्थ! ...नहीं , सत्य प्राप्ति का साधन है। शरीर- जिससे जीवन की चलायमान प्रक्रिया जीवंत होती है। शरीर में आत्मा। आत्मा- जीवन। आत्मा जीव। जीव- जी रहा है, शरीर तो पहले ही मरा हुआ है, जीव प्रेरित करता है, शरीर एक इन्स्ट्रूमेंट की भांति मात्र कार्य करता है। विचार- मस्तिष्क का खेल। मस्तिष्क में आत्मतत्त्व होते हुए भी ग्राहकम क्षमता होती है- संासारिक ग्राहक। संसार के विभिन्न आयामों को ग्रहण कर मस्तिष्क उन्हें स्वयं के लिए स्वीकार्य/अस्वीकार्य करता है। जीव का भवन शरीर जहाँ रहता है वहीं से जुडती है उसकी लोकयात्रा के प्रारम्भिक चरण। जहाँ संगत/साथ/संग का स्पर्श या विचारों में कुलबुलाहट होती है। मिथ्या जगत के मिथ्या व्यवहार का असर इस अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मनुष्य के साथ ही ये सब होता है, हाँ, संगति का असर सब पर - जीवन के सफर/ यात्रा में अनेक छोटे-मोटे पडाव, बदलते संदर्भ, जिजीविषा में झटपटाता भाव-मनस, स्वयं में स्वयं की प्रतिछाया -प्रतीत होता है। जीवन-मार्ग पर चलकर, दुर्गम - सुगम, झाड-झंकाडों -उपवनों से गुजरकर अपने लक्ष्य की ओर बिना सोचे समझे बढता है- ‘मौत’ परम लक्ष्य है उसे भूलकर। ‘मौत’  स्वयं भुलावा देकर ‘जीव’ की यात्रा को विराम देती है, ये मात्रा एक लंबा पडाव है। विराम है। जीवन की समाप्ति नहीं। फिर से नये जीवन, नये संघर्ष के लिए - यह सब जरुरी ।
मैं यहाँ मौत की गुत्थी सुलझाने या उलझाने नहीं बैठा, न ही लंबा- चैडा मोक्षदायक प्रवचन देने के लिए। हाँ, कुछ हद तक प्रवचन जैसा जरुर है।
आज शव‘-यात्रा में शामिल हुआ। ‘ओइम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है’ के उद्घोष के साथ - शुरुआत हुई इस जुलूसकी।...श्मशान तक सब जनों के भाव में क्षणिक वैराग्य उत्पन्न हुआ। हम सभी पल भर में आत्मज्ञानी हो गये। अंतिम क्रिया के बाद वही दुनियावी काम-धंधे , छल-प्रपंच, दुखडा रोना, घर-गृहस्थी- सब पुराना टंटा वही राग...मोह की जकडन...संसार का गतिमान होना -बात एक ही है- विराम में संसार नहीं ...संसार में विराम नहीं...
-.सत्येन्द्र कात्यायन


भूली बिसरी बातें-----------1


भूली बिसरी बातें



प्रेम को शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। ये प्रेम मात्र लैला-मजनू वाला नहीं, कृष्ण-मीरा का नहीं, माँ-बेटे, भाई-बहन, प्रकृति से लगाव इत्यादिक हो सकता है।

06 दिसम्बर 2010 को तिस्सा गया। वहां से बाहर आने के लिए तांगे में बैइ और सवारियंा भी थी। पति-पत्नी भी, माँ-बेटियां भी थी, पोता-दादी थी। कई रिश्तों को ढोता हुआ तांगा चलने को था। दो लडकियाँ - गाँव की भोली-भाली छोरियाँ - अपनी माँ के साथ जा रही थी - तांगे में बैठी थी। अपने पापा को अपना शाॅल लेने घर भेजा। पिता साइकिल पर दौडता गया और शाॅल - दो शाॅल ले आया, बेटियाँ बातें कर रही थी- ‘ मम्मी, पापा का हमारे बिना जी नी लगने का, देख अब भी खडे़ है?, दूसरी बोली - ‘ मम्मी का बी कहाँ लगा तभी तो साथ चल दी, अब बाप जो खडा था उसकी आँखों में निर्मल प्यार का बहाव दिखा- भीगी थी उसकी आँखें। धोती कुर्ते पहने, गंजे सिर के अलावा बस उसकी आंखें थी जो भाव के इस निर्मल बहाव में गोते लगा रही थी। वपह तांगे वाले से थोडा खिंझाता,थोडा मुस्कराता सा बोला -‘ चल बे, तावली कर तांगे कू हांक। सवारी -ववारी बिठा तो ली, चलता बन अब।’ स्वयं वह पिता साइकिल को हाथ में थामें खडा रहा। उसकी एक बेटी ने उससे फिर कहा- ‘ पापाप, कपडे बदललियो, ’.. दूसरी ने कहा - ‘ खाना टाईम पे खाला करो’ । वो फिर भीगता हुआ सा बोला - ‘ ओये तावली कर, बढा आगे।’ एक बेटी फिर माँ से बोली - ‘ पापा से नवा शाल जो धोके रक्खा था, वो कहा था लाने कू, लियाए यो’ पिता साइकिल पर सवार होता से देखता रहा और बोला - ‘ ठीक है यू बी... जाओ।’ तांगा चल पडा, फिर से एक बेटी ने माँ से कहा - ‘पापा बिरान से हो जांगे, जी नी लगने का उनका म्हारे बिना, म्हारा बी नी लगने का...बाप खडा था अभी - तांगे को एकटक देख रहा था - मानो आज बेटियो की विदाई करके लौटेगा। और वह उन्हें शायद तब तक देखता रहा जब तक उसकी आंखो से वो तांगा ओझल नहीं हो गया।

मैंु ये सब दृश्य देख रहा था, मन ही मन सोच रहा था - बाप-बेटी के प्रेम की । कितना सच्चा, कितना निर्मल, कितना प्रगाढ प्रेम। परिवार इसी का नाम है। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना इसमें छिपा अनबोला प्रेम भाव।


-सत्येन्द्र कात्यायन . डायरी .............7 दिसम्बर 2010

सुन नापाक पाक


बहनो का सिंदूर छीना है
माताओ का लाल
                                ऐ वैरी तू कायर बन 
छिप छिप करता वार
लडना है तो 
मैदानों में खुले आम आ कर के देख
चीर के रख देंगे 
नक्शे से मिट जायेगा नाम
छिपकर क्यूं करता है वार

वीर शहीदों की विधवाओं के 
आंसू में तू बह जायेगा
जिस माता का लाल मिटा
उसका श्राप तूझे खायेगा
छिप ले जितना छिपना तुझको
काल तेरा भी आयेगा 
वीर नहीं है कम हुए वतन में
चाहे हो नेता गददार........
-सत्येन्द्र कात्यायन

पाक अब माफ करने के काबिल नहीं है-----------------------------------------

पाक के नापाक इरादे और भी मजबूत होते जा रहे है और इसकी वजह है भारत उसे अब तक कडा जवाब देने में असफल रहा है । ईंट का जवाब पत्थर से की जगह भारत बार बार अदने से पाकिस्तान से मात खा रहा है । पांच भारतीय जवानों को गश्त करते वक्त मौत के घाट उतार देना बडा दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद है - यह सम्पूर्ण भारत के लिए दुःख का विषय है परंतु अब मात्र दुःख व्यक्त करने से कोई काम नहीं चलने वाला है । इस वक्त जरुरत है तो पाकिस्तान को एक कडे जवाब देने की -वो भी उसी की भाषा में। हत्या की है तो इसका इंतकाम भी पाकिस्तान के आंतकी सिपाहियों को ढेर करके ही लिया जा सकता है। भारत के नपुंसक शासक कुछ नहीं कर पाते। पाक बार बार हमारी सीमाओं पर आक्रमण करता है। कभी हमारे सिपाहीं के शीश काट ले जाता है - हम सहते है पूरे गर्व से सहते हैै और सैनिकों की शहादत को जाया जाने देते है- यदि इसे सहनशीलता कहा जाता है तो धिक्कार है ऐसी सहन शक्ति पर जो नपुंसकों को भी लज्जित कर दें। जब रणबांकुरे देश के लिए मर-मिटने को तैयार है , सर्वस्व समर्पित करने को तैयार है तो तो फिर रण का बिगुल अब तक क्यों नहीं बजाया गया । क्यूं बार बार इसकी कीमत हमारे जांबाज सैनिकों को चुकानी पडी। इन हमलों से साफ जाहिर है कि पाक कभी शांति चाहता ही नहीं था और न ही अब वो शांति प्रंक्रिया को बनाये रखना चाह रहा है और ये भी साफ है कि पाकिस्तान के सैनिक अभियानों में आंतकवादियों को पूर्ण सहयोंग रहता है। बल्कि यदि कहें कि पाकिस्तानी सेना भी आंतकवादियो ंसे कमतर नहीं है तो अतिशयोंक्ति न होगी। पाक नापाक है । वो जब से विलग हुआ है तब से भारत के खिलाफ उसके अभियान जारी रहे है और हम एकतरफा की शांति बहाली की कोशिशें बराबर करते रहें । नतीजा सामने है। वो तो छापामार युद्ध कर रहा है और हम उस पर रहम करते जा रहे है। रहम भी उस पर जो बार बार हमारी गर्दन पर छुरा चला रहा हो। पाक हमेशा से आतंकियो ंका गढ रहा हैं । जेहाद के नाम पर चल रहे आतंकी अभियान मानवता पर कहर बरपा रहे है और मानवीयता को तार तार कियें। ये कैसी लडाई लड रहें है ये बुजदिल लोग जो छिपकर वार करना जानते है, जो पीठ में खंजर घोंपने के आदि हो चुकें हैं। पाक के नापाक चेहरे की तस्वीर बार बार उभर कर आती है और हम उसे फिर भी दुलारते रहे, पुचकारते रहें उसके साथ प्रेम की भाषा बोलते रहें और वो उदण्डता करता जा रहा है । इसे भारत का बडप्पन नहीं कहा जा सकता , ये मेरे मुल्क के प्रशासकों, शासकों की सबसे बडी बेवकूफी है। अब हमें इस तरह चुप होकर नहीं बैठना चाहिए। भारत के पावन सिंहासन को कलंकित करती ये सरकार देश को लज्जित करने में अपना जितना हो सका योगदान दे रही है।  ये बेहद दुर्भाग्य पूर्ण ही नहीं आत्मा को कचोटने वाला है कि हम पाकिस्तान के हाथों,.... एक अदने से मुल्क के हाथों शिकस्त खाते रहे है और वो हम पर हावी होता जा रहा है । तो क्या समझा जाऐ भारत अपनी प्राचीन परम्परा का निर्वाह नहीं कर पा रहा है! हमारी तोपो को बारुद खत्म है या बंदूकों में जंग लगा है। हम क्यों इतने भीरु हुए जा रहें है कि कोई हमारे गालों पर तमाचे लगाये जा रहा है और हम बिना रोये बिना चिल्लाये बिना उसका प्रतिकार किये सह रहें है। हम इस तरह खुद को महात्मा बना रहें हैं! महात्मा!! ......यदि आज विवेकानंद होते , भगत होते, सरदार पटेल होते, चंद्रशेखर होते तो भारत की इस दशा पर रो पडते ......फफक पडते ..........हमे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाले ंदेश के असंख्य कर्णधार इस परिस्थिति में क्या चुप रहते ? मौन साधते? या फिर क्रांति का बिगुल बजता। क्रांति आज जरुरी है । देश के रक्षा मंत्री ही पाकिस्तान की इस करतूत पर आहत तो क्या होते वरन उसे क्लीनचिट दे देते है - ये दुर्भाग्य है वतन का कि जो इसकी आबरु को तार तार किये जा रहे है उन्हें पर हम रहमत बरसा रहे हैं।
देश की आंतरिक हालत बेहद नाजुक है। ये आंतरिक बहस का वक्त नहंी है ये है इस सम्पूर्ण मामलें को , पूरे प्रकरण को देश भावना से जोडना चाहिए न कि एक दूसरे को नीचा दिखाने में वक्त जाया करना चाहिए। फब्तियां कसना सीखना हो तो राजनीतिक गलियारों में होने वालो कार्यक्रमों में शिरकत करके आसानी से सीखी जा सकती है। देश को आंतरिक रुप से बंाटने की साजिश हो रही है। राज्यों का बंटवारा .....लोगो का बंटवारा .........आत्मा का बंटवारा ........बंटवारें की राजनीति, देश को भुला रहीं है........ हम अनेकता में एकता के पाठ को भूल रहें है। अब वक्त बहस-मुहाबिसों का नहीं वक्त है मजबूत सटीक और देश हित में निर्णय लेने का । अब वक्त आ गया है- पाक की नापाक हरकतों पर रोक लगाने का। होश में हमनें बहुतेरे काम किये है। पर सेना को आर्डर की जरुरत है और बूढें शासक युद्ध के नाम पर कांपने लगते हैं। उनकी शिराओं का रक्त सूख रहा है पर नौजवान पीढी बदला चाहती है ......देश जांबाजों ने देश के लिए बलिदान दिया उसका जवाब पाकिस्तान को दिया जाना जरुरी है। भारत को सरहद पर किये पाक के घिनौने कृत्य के लिए उसे सजा देनी चाहिए , पाक अब माफ करने के काबिल नहीं है। उसे मंुहतोड जवाब देना चाहिए।
वन्दे मातरम्! वन्दे मातरम!!
- सत्येन्द्र कात्यायन

रविवार, 31 मार्च 2013

तमाशा...


तमाशा...


किसान, गरीबी और मंहगाई ...सत्येन्द्र कात्यायन




किसान, गरीबी और मंहगाई ...



खेतों की काली मिट्टी
मिट्टी को आकार देता किसान
क्यारियां बना रहा
हाथों में लिए फावडें से
धरती का श्रृंगार कर रहा
कहीं लम्बी-लम्बी क्यारियां

कहीं चैकोर
मेढ बंाधता
नालियां बनाता
फांसला देते हुए 
इस काम के बाद 
सींचता जमीन

मिट्टी के कण कण को करता तृप्त
बुझाता प्यास मिट्टी की
खेत करता  तैयार
खेतों में बोने लगता ....
छोटा किसान शाक सब्जी
बडा किसान गेहूं, चावल, गन्ना आदि
इन सबों के लिए 
करता ऋतुओं का इंतजार

शीत घाम सब दिवस 
करता रखवाल खेतों की
चावल के लिए 
पानी भरता खेतों में
या करता वर्षां का इंतजार
तालाबनुमा खेत
धंसते पैर
लंगोटी कसके बांधे
औरते साडी की लंगोटी सी बनाती 
हाथ धंसाध्ंासा कर पौध्ेा रोपते
जमीन में पैदा होते न जाने कितने जीव जंतु
जोंक आदि
रोक नहीं पाते किसान को
वो बराबर करता काम
बराबर करता जाता काम
हांफता हुंफता करता काम
घर के सब जन खेती के दिनों में
लगे रहते पूरे पूरे दि न
खेत के बाद 
टहल करता घर के जानवरों की
घर की 
खेत जब लहलहाते
सुनहरी चादर तानती धरती 
सब्जियां उगती दो दो माह बाद नयी नयी
कभी आलू कभी कचालू
कभी भिण्डी कभी तोरई
कभीर गोभी कभी पालक
कभी टमाटर कभी गाजर
कभी कुछ तो कभी कुछ
बदली सब्जियां 
बदलता जिन्दगी का स्वाद 
जीवन में भरता रस
 किसान झूमता 
मगन होता 
अब वो पहले वाले गीत तो नहीं गाता
पर रेडियो ंया एफ0 एम0 या मोबाइल पर सुनता
कोई अपना पसंदीदा गीत
मस्ती में मस्त होकर 
फसल की करता देखभाल
इस मस्ती में मिठास है तो चिन्ता की खटाई भी
खेत में लहलहाती फसल
कोई भी देखकर झूम सकता है
पर जिसने रोपा
जिसने जोता खेत को
जिसने दिन रात देखभाल की 
एक एक पौधे की 
खेत को जो है पालता पोसता
और फिर बेचता है अपने पेट के लिए
फसलों को ओने पोने दाम पर 
वह उस वक्त मेहनत की याद करता है
सारे दृश्य उसके सामने आते
जब वो चिडियों से बचा रहा था एक एक दाना
उडा रहा था हर पक्षी को
कही खेतों में खडा किया था हव्वा
आदमीनुमा जिसे देखकर उड जाते पक्षी
और कभी कभी तो अनजान आदमी भी भय खा जातें
वो बचा रहा उन्हें सभी की नजरों से
आज बेच रहा है 
बेचने के लिए ही तो 
की थी उसने इतनी मेहनत
पर मेहनताना जब ठीक ना मिले 
तो जी में कुछ अजीब सा होता है
वो सोचता है पर सोचने से क्या होता है
इस स्थिति से गुजरता है रोज छोटा किसान
बडा तो आखिर बडा है 
नौकर चाकर सौ झंझट है उसके पास
छोटा किसान जब इस दौर से गुजरता
जोड नहीं पाता दो वक्त का अनाज
खा नहीं पाता जब भर पेट 
और लड नहीं पाता मंहगाई से 
तब वो खिन्नता से भर जाता है 
कई तो बेचते है अपनी धरती मां को
और करते है कुछ और
कुछ भी 
उस कुछ में चाहे मजदूरी हो 
चाहे छोटा मोटा व्यापार
जिससे वो आज के जमाने में पाल सके अपना परिवार
सरकार देती कहां ध्यान
गरीब की जात पूछी जाती या गरीबयत
कौन सुनता गरीब की अरदास 
गरीब तो पहले भी गरीब था आज भी
पहले भी उसे पेट काटना पडता था आज भी
आज तो वो इस पापी पेट को कोसता है
जो ये ना होता तो वो भी गरीब ना होता 
वो चिंतित ना होता
ना होती उसे कोई कमी 
ना बेचता गरीब किसान जमीन
ना लेता कर्ज 
ना करता आत्महत्या 
पर ये सब होना था 
हो रहा है
होता रहेगा
- ऐसा कहकर
इससे पार पाया जा सकता है?
क्या ऐसा कहकर मेढे बनायी जा सकती है
क्या क्यारियां की जा सकती है तैयार
और उगाई जा सकती है सभी के लिए तरकारियां 
क्या मोटे मोटे अमीर आदमी 
पल सकते है बगैर किसान के
जो उसी किसान को मजदूर बनाने में भी नहीं शर्माते

-सत्येन्द्र कात्यायन 'सत्या'
अन्नदाता की जब ये हालत तो 
जिसके पास ना धरती मां है 
ना कुछ 
जो करता है मजूरी
तब वो क्या बेचेगा
अपनी समस्या से निजात पाने के लिए
शायद खुद को!


- सत्येन्द्र कात्यायन 


शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

आया बसंत.....


किशोर बसंत, सर्द हवाओं का बहना कुछ कम, सूर्य किरणों का अद्भुत खेल एवं सुनहरी छटा, पक्षियों का मुक्तकंठ गान... दुनियां केे मंच को नवीनता और रोमांच से उन्मादित करता हुआ आया -बसंत। एक रुमानी नशा चारों ओर फिजाओं में छा रहा है। हर दिल कवि बनना चाहता है। कोई कुछ कहें या न कहे प्रकृति का सुन्दर मुख सब कुछ वर्णित करने में समर्थ है। प्रकृति में नया ओज, नयी क्रांति, नयी उमंग, नयी लय, नयी लहर, नया जोश, नया वासंती रंग चहुं ओर बिखरा सा यही संदेश देता है -

ढककर स्वयं को इस लिबास में
बढते जाना है आगे
आत्मिक सुख के अवसर है
आ बढ़ कुछ आगे तो बढ
मन को नेह का पठ  सीखाने
तन की दुति कोमलता को जगाने
पापभाव से निकल जरा देख
अम्बर तल छू रहा धरा को
हे मानव! सुन भोर हुई है
लालिमा बिखेर रहा सूर्य
संध्या की मधुरिम झांकी
देखने को भोर में चल
चल बढ आगे
तेरा मन स्थिर न हो
वासंती चोला हो न हो
वासंती संग प्रकृति हो
स्वयं को वासंती रंग में रंग


प्रकृति में संगीत की अनुपम छटा बिखरती है- पक्षी कलरव कर करके संगीत की लय, गति, आरोह-अवरोह को व्यंजित करने से से नहीं चूकते। इस नव विहान में प्रकृति में होता आया -एक बडा, विशाल, विराट परिवर्तन जिसमें उल्लास है, उमंग है, चेतना है और पथ की कंटकता के प्रति विद्रोह हैै।
वृक्ष झूमते हुए न जाने किस बोली, किस भाषा में कुछ गाते हुए हमें सिखाते हैं। अविराम विकसन प्रक्रिया का प्रक्रम। पतझर में ठंूठ बना वृक्ष आशाओं के नवीन पत्रों से लदा होता है। कुछ इस तरह -

हारना आता नहीं
ठूंठ तो मैं बन चुका हूँ
पर नहीं थकित
अस्तित्व मेरा
अस्तत्व मेरा कभी न मिटेगा
राख भी हो जाऊँ
तब भी नहीं
मैं बहूँगा वायु के संग
जल के भीतर
पृथ्वी के कण-कण से चिपका रहूँगा
मैं नहीं हारा
संघर्ष करता रहा
निरंतर बढता रहा
हे बसंत करता नमन तुझे
तूने दिया नव जीवन मुझे
कह रहा हूँ-भाव अपने
पांखुरी से गीत सुनाता चला
हाँ! मैं हुआ फिर से भरा
पर मैं न हारा था न हारा हूँ
मैं बढ रहा हूँ
उत्थान -पतन के भय से विलग हो


पृथ्वी पर स्थित नभ चुम्बित पर्वत-अटल, अचल सिद्धांतों को और भी दृढ़-दृढेत्तर बनाने के लिए संदेश देते हैं। प्रकृति का कण-कण उल्लासित, कण-कण में नवीन चेतना प्रस्फुटित होती है- आया बसंत।




-सत्येन्द्र कात्यायन, एम0ए0(हिन्दी, शिक्षाशास्त्र) , बी.एड.,नेट(हिन्दी), शोधार्थी(हिंदी)

हम और हमारा राजतंत्र



विचार की गहन उथल-पुथल दिमाग को मथ रही है.........

वर्तमान में देश भर में पूंजीपति भरे पडे हैं। ऐसे-ऐसे धनाढ्य जो विश्वस्तर पर अद्वितीय स्थान बनाये है परंतु लगता है इन सबों का अधिक ध्यान देश की तरफ कम रहता है विश्व बाजार की तरफ अधिक। कम्पनियों की जो समस्या फिलवक्त बढ रही है उसमें तो सम्पूर्ण योग यहाँ के राजनेताओं का ही है जो किसी न किसी रुप में कम्पनियों से मुनाफा खाना चाहते है, बनाना चाहते है। उनके एजेण्ट बने हुए है -प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से। विदेशी कम्पनियों का भला करने में जुटा हुआ है प्रत्येक राजनेता- किसी न किसी रुप में  और स्वदेशी कम्पनियो ंके साथ सौतेला व्यवहार किया जाता रहा हैै। विदेशी कम्पनियों ने पहले भी बाजार पर बेहद मजबूत पकड बना रखी है, सब इसकारण की उन्हें यहाँ के बजार में अपना माल बेचने की खुली छूट दी जाती रही और इसी का परिणाम ये है कि आज एक आम नागरिक भी विदेशी कम्पनियों के प्रति श्रद्धा रखता है -उसके परिणाम को बिना जाने। उन्हें ये तक पता नहीं होता कि जिन कम्पनियों का हम माल खरीद रहें है उसका लाभ देश को नही ंके बराबर हो रहा है और विदेशों में हमारा धन अनायास ही जा रहा है। यह सब देश के लिए घातक है। स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और पुनः हम गुलाम होने की कगार पर पहुँचते जा रहे हैं। अपनी पिछली गलतियो ंसे कोई सीख नहीं ले रहें। हमारे देश में आज एक से एक बढकर निर्माता है और जिनमें गुणवत्ता भी और दाम भी विदेशी कम्पनियों के मुकाबले बेहद कम। हमारी सरकार उन स्वदेशी कम्पनियों को मौके देना ही नहीं चाहती और वर्षो से यही होता रहा है कि भारत जैसे समृद्धशाली देश में विदेशी कम्पनियां आकर यहाँ की स्वदेशी कम्पनियों को टेकओवर करती है -ये सब होता है हमारे लचीले कानून के कारण। कानून इतना लचीला रहा है कि ये कम्पनियां बिना किसी भय के अपने पैर जमाती जाती है जिसमें इन्हें टैक्स आदि की भी भरपूर छूट दी जा रही है। सभी राज्यों में विदेशी कम्पनियों की बाढ आ रही है। अब इसे स्वार्थ की राजनीति ही कहा जायेगा। सरकार की स्वार्थी नीतियों के कारण सब गुड गोबर हो रहा है। आज दलगत राजनीति के साथ साथ स्वार्थ परक राजनीति चल पडी है जिससे देश का भला होने वाला नहीं।
विदेशी व्यक्ति और विदेशी सामान के प्रति भारतीयों का लगाव प्रारंभ से ही रहा है। हम विदेशी सामान रखने में अपनी शान समझते है बल्कि जो चीजें हमारा देश निर्यात करता है यदि वो भी हमें विदेशी प्राप्त हो जाये तो हमेे अपार संतोष होता है और स्वयं को सम्मानित महसूस करते है कि मेरे पास ये विदेशी वस्तु है परंतु यदि गौर करें तो यह देश के साथ गद्दारी है जो हम करोडों भारतीय अनायास ही कर बैठते है और जान भी नहीं पाते कि हमने अपने देश के कितने हजार करोडों को मुनाफा विदेशियो ंके हवाले कर दिया । इसमें मुख्य दोषी के रुप में तो सरकार ही है जो आमंत्रित करती है विदेशी कम्पनियों को अपने देश में व्यापार के लिए। व्यापार के लिए आमंत्रित करें, अच्छी बात, पर लूट के लिए आमंत्रित करें ये तो सरासर गद्दारी हुई। नियमों और शर्तों में ढील बल्कि विदेशी हित को ध्यान में रखकर ही बनायी जाती है - अधिकांश व्यापारिक नीतियां जो घातक सिद्ध होती है देश के लिए।
ये हमारा लोकतंत्र लोकतंत्र कम राजतंत्र ही ज्यादा दिखता है जहाँ पर कुर्सी प्राप्त करने के उपरांत जनता को ठेंगा दिखाया जाता है। भोली भाली जनता ये भी नहीं समझ पाती कि ठेंगा क्यूं दिखायी देता है? जिसमें देश को चलाने वाले स्वयं को चलाने में ही विश्वास रखते हैं। स्वयं के कल्याण में उनका विश्वास देखने लायक है फिर बात ठीक भी है- स्वार्थी व्यक्ति देश को कोडियों के भाव बेच सकता है यदि उसकी स्वार्थ पूर्ति होती है तो। ऐसा ही हुआ है- भारत के इतिहास में बार-बार। कितनी बार स्वार्थियों ने, गद्दारों ने देश को गुलाम बनवाया । कितनी बार लूटे हम, .....हर बार लुटकर भी हम आकर्षित हुए विदेशी लोगों की तरफ। हमारा कानून -देश के राजनेताओं की दिमागी उपज बना जिसमें अधिकतर नियम उधार लिए हुए है- विदेशों से। हमारे राजनेताओं के लिए तो धन सर्वोपरी है और देश की मान प्रतिष्ठा से उन्हें शायद कोई लेना देना ही नही। अपने मान सम्मान के सपने देखने वाला देश की प्रतिष्ठा को कब दांव पर लगा बैठे, कुछ नहीं कहा जा सकता। देश की जनता को गुमराह करने के अनेक तरीके ईजाद करते है -राजनेता। जिनमें लुभावनी योजनाएँ होती है पर उन्हें कागजी पुलिंदों में ही बंधा रहने दिया जाता है और प्रचार किया जाता है बढा चढा कर । अमलीजामा तो कभी योजनाओं को पहनाया नहीं जाता और यदि कुछेक को पहना भी दिया जाता है तो वो जामा अधिक दिनों तक चल नहीं पाता और या तो सरकार बदलने पर योजनाएँ बदल जाती है या फिर योजनाओं का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है, उनका लाभ भी किसी न किसी रुप में राजनेताओं को मिल ही जाता है और कुछ खास नागरिकों को जो नेताओं के विश्वास पात्र होतें है। आम आदमी देखता है, बस देखता है। स्वयं को लूटते हुए, देश को लूटते हुए।

-सत्येन्द्र कात्यायन 

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A