सोमवार, 19 अगस्त 2013

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी


आजकल कद बढाने में कद्र को कम आंकते
कर्ज लेकर ही सही तन तो सजाना पडता है













है हवस की खोपडी, भरती नहीं है ये जनाब
दोस्त को भी कभी दुश्मन बनाना पडता है

गुमसुम जो बैठा हुआ है मूर्ति के सामने - मूरख वो!
इस जमाने में तो सबको मक्खन लगाना पडता है

जख्म गहरा हो, भर जायेगा इक न इक दिन
दिल के जख्मों को वक्त का साथ निभाना पडता है

छोडकर वो भीड में सामान अपना, चल दिए
कई मर्तबा जिन्दगी को जिन्दगी से बचाना पडता है

रुआंसा चेहरा लिए कोई बच्चा खडा है देर से
हाथ फैलाये , वो मंगता बना है
देखते हैं- देखकर मुंहफेर लेते है साहब
देखकर सब, रुलायी को मुंह छिपाना पडता है

भीड है बस भीड में खो रहा है आदमी
आदमियत को बचाने में जमाना लगता है

वजूद का जिक्र करते है बहुत लोग
वजूद में जिस्म औ’ शोहरत केा दिखाना पडता है

क्या करें शिकवा गिला, कुछ कर नहीं सकते हैं हम
‘सत्या’ इस जमाने में खुद को फंसाना पडता है


- सत्येन्द्र कात्यायन



सच और मौत..........................


मौत!... सच!, सच और मौत...दोनों एक सिक्के के दो पहलू। सिक्का - एक, पहलू दो। ‘जीवन’ का सफर, मौत - मंजिल। हिन्दूशास्त्र हो या विश्व का कोई ओर दर्शन सबने स्वीकारा है -मृत्यु को। यह मौत दबे पांव न जाने कब, किस वक्त, कैसे इंसान को, संपूर्ण सृष्टि को अपने शिकंजे में ले लेती है या यूं कहे आगोश में भर लेती है फिर वह उस जीव को इस कदर प्यार करती है, दुलारती है कि उसके आगोश से बाहर आ पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है, मौत- एक रहस्य!

एक ऐसा रहस्य जिसे जानने-समझने की कोशिश में हम खुद को इस सफर से उस सफर तक लादे फिरते है सिर्फ लादे और कुछ नहीं अंततः मौत हमें आगोश में ले ही लेती है और रहस्य मात्र एक रहस्य बना रहता है। एक भेद- जिसे भेदना असम्भव। दावे करने से कुछ नहीं होता, कुदरत की इस रोमांचकारी घटना में रद्दोबदल नहीं की जा सकती। मौत ही मनुष्य की वास्तविक प्रकृति है। बाकी सब - सारा जीवन मात्र एक ढकोसला। रंगमंच है- जीवन ।हम अपने अपने किरदार निभाकर अंत में अपनी वास्तविक प्रकृति में आ पाते हैं, हम प्रकृति में लीन हो जाते हैं। पाप-पुण्य- सब जीवन कर्मों में घुलकर रह जाता है, यथेष्ट फल भोगकर ही अंतिम यात्रा का टिकट मिलता है।
शिव को तीन रुपों - निर्माणकत्र्ता, पालनकत्र्ता, संहारकत्र्ता में परिभाषित किया जाता है, ये रुप विष्णु तुल्य हो या शिव तुल्य। सृष्टि चक्र में सम्मिलित है। विनाश के उपरांत- सृजनकी प्रक्रिया चिरस्थायी है। वाह्य लोक से अंतर्लोक की यात्रा - मात्र कहने भर से नहीं होती। योग का नाम मात्र लेने से ‘योगी’ नहीं बन जाते, भक्ति में बिना डूबे भगवत प्राप्ति नहीं होती, ज्ञान हेतु स्वयं का शोध - उतना ही आवश्यक है जितना शरीर के लिए भोजन।
जीवन है तो मृत्यु भी है। मृत्यु है - इसलिए जीवन भी। आरोह- अवरोह का क्रम मात्र गणितीय प्रक्रम को ही प्रकट नहीं करते वरन् प्रकृति में भी ये क्रम पुनः पुनश्च चलता रहता है।
जब मृत्यु सत्य फिर जीवन। व्यर्थ! ...नहीं , सत्य प्राप्ति का साधन है। शरीर- जिससे जीवन की चलायमान प्रक्रिया जीवंत होती है। शरीर में आत्मा। आत्मा- जीवन। आत्मा जीव। जीव- जी रहा है, शरीर तो पहले ही मरा हुआ है, जीव प्रेरित करता है, शरीर एक इन्स्ट्रूमेंट की भांति मात्र कार्य करता है। विचार- मस्तिष्क का खेल। मस्तिष्क में आत्मतत्त्व होते हुए भी ग्राहकम क्षमता होती है- संासारिक ग्राहक। संसार के विभिन्न आयामों को ग्रहण कर मस्तिष्क उन्हें स्वयं के लिए स्वीकार्य/अस्वीकार्य करता है। जीव का भवन शरीर जहाँ रहता है वहीं से जुडती है उसकी लोकयात्रा के प्रारम्भिक चरण। जहाँ संगत/साथ/संग का स्पर्श या विचारों में कुलबुलाहट होती है। मिथ्या जगत के मिथ्या व्यवहार का असर इस अपनी गिरफ्त में ले लेता है। मनुष्य के साथ ही ये सब होता है, हाँ, संगति का असर सब पर - जीवन के सफर/ यात्रा में अनेक छोटे-मोटे पडाव, बदलते संदर्भ, जिजीविषा में झटपटाता भाव-मनस, स्वयं में स्वयं की प्रतिछाया -प्रतीत होता है। जीवन-मार्ग पर चलकर, दुर्गम - सुगम, झाड-झंकाडों -उपवनों से गुजरकर अपने लक्ष्य की ओर बिना सोचे समझे बढता है- ‘मौत’ परम लक्ष्य है उसे भूलकर। ‘मौत’  स्वयं भुलावा देकर ‘जीव’ की यात्रा को विराम देती है, ये मात्रा एक लंबा पडाव है। विराम है। जीवन की समाप्ति नहीं। फिर से नये जीवन, नये संघर्ष के लिए - यह सब जरुरी ।
मैं यहाँ मौत की गुत्थी सुलझाने या उलझाने नहीं बैठा, न ही लंबा- चैडा मोक्षदायक प्रवचन देने के लिए। हाँ, कुछ हद तक प्रवचन जैसा जरुर है।
आज शव‘-यात्रा में शामिल हुआ। ‘ओइम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है’ के उद्घोष के साथ - शुरुआत हुई इस जुलूसकी।...श्मशान तक सब जनों के भाव में क्षणिक वैराग्य उत्पन्न हुआ। हम सभी पल भर में आत्मज्ञानी हो गये। अंतिम क्रिया के बाद वही दुनियावी काम-धंधे , छल-प्रपंच, दुखडा रोना, घर-गृहस्थी- सब पुराना टंटा वही राग...मोह की जकडन...संसार का गतिमान होना -बात एक ही है- विराम में संसार नहीं ...संसार में विराम नहीं...
-.सत्येन्द्र कात्यायन


भूली बिसरी बातें-----------1


भूली बिसरी बातें



प्रेम को शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। ये प्रेम मात्र लैला-मजनू वाला नहीं, कृष्ण-मीरा का नहीं, माँ-बेटे, भाई-बहन, प्रकृति से लगाव इत्यादिक हो सकता है।

06 दिसम्बर 2010 को तिस्सा गया। वहां से बाहर आने के लिए तांगे में बैइ और सवारियंा भी थी। पति-पत्नी भी, माँ-बेटियां भी थी, पोता-दादी थी। कई रिश्तों को ढोता हुआ तांगा चलने को था। दो लडकियाँ - गाँव की भोली-भाली छोरियाँ - अपनी माँ के साथ जा रही थी - तांगे में बैठी थी। अपने पापा को अपना शाॅल लेने घर भेजा। पिता साइकिल पर दौडता गया और शाॅल - दो शाॅल ले आया, बेटियाँ बातें कर रही थी- ‘ मम्मी, पापा का हमारे बिना जी नी लगने का, देख अब भी खडे़ है?, दूसरी बोली - ‘ मम्मी का बी कहाँ लगा तभी तो साथ चल दी, अब बाप जो खडा था उसकी आँखों में निर्मल प्यार का बहाव दिखा- भीगी थी उसकी आँखें। धोती कुर्ते पहने, गंजे सिर के अलावा बस उसकी आंखें थी जो भाव के इस निर्मल बहाव में गोते लगा रही थी। वपह तांगे वाले से थोडा खिंझाता,थोडा मुस्कराता सा बोला -‘ चल बे, तावली कर तांगे कू हांक। सवारी -ववारी बिठा तो ली, चलता बन अब।’ स्वयं वह पिता साइकिल को हाथ में थामें खडा रहा। उसकी एक बेटी ने उससे फिर कहा- ‘ पापाप, कपडे बदललियो, ’.. दूसरी ने कहा - ‘ खाना टाईम पे खाला करो’ । वो फिर भीगता हुआ सा बोला - ‘ ओये तावली कर, बढा आगे।’ एक बेटी फिर माँ से बोली - ‘ पापा से नवा शाल जो धोके रक्खा था, वो कहा था लाने कू, लियाए यो’ पिता साइकिल पर सवार होता से देखता रहा और बोला - ‘ ठीक है यू बी... जाओ।’ तांगा चल पडा, फिर से एक बेटी ने माँ से कहा - ‘पापा बिरान से हो जांगे, जी नी लगने का उनका म्हारे बिना, म्हारा बी नी लगने का...बाप खडा था अभी - तांगे को एकटक देख रहा था - मानो आज बेटियो की विदाई करके लौटेगा। और वह उन्हें शायद तब तक देखता रहा जब तक उसकी आंखो से वो तांगा ओझल नहीं हो गया।

मैंु ये सब दृश्य देख रहा था, मन ही मन सोच रहा था - बाप-बेटी के प्रेम की । कितना सच्चा, कितना निर्मल, कितना प्रगाढ प्रेम। परिवार इसी का नाम है। यह घटना इतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना इसमें छिपा अनबोला प्रेम भाव।


-सत्येन्द्र कात्यायन . डायरी .............7 दिसम्बर 2010

सुन नापाक पाक


बहनो का सिंदूर छीना है
माताओ का लाल
                                ऐ वैरी तू कायर बन 
छिप छिप करता वार
लडना है तो 
मैदानों में खुले आम आ कर के देख
चीर के रख देंगे 
नक्शे से मिट जायेगा नाम
छिपकर क्यूं करता है वार

वीर शहीदों की विधवाओं के 
आंसू में तू बह जायेगा
जिस माता का लाल मिटा
उसका श्राप तूझे खायेगा
छिप ले जितना छिपना तुझको
काल तेरा भी आयेगा 
वीर नहीं है कम हुए वतन में
चाहे हो नेता गददार........
-सत्येन्द्र कात्यायन

पाक अब माफ करने के काबिल नहीं है-----------------------------------------

पाक के नापाक इरादे और भी मजबूत होते जा रहे है और इसकी वजह है भारत उसे अब तक कडा जवाब देने में असफल रहा है । ईंट का जवाब पत्थर से की जगह भारत बार बार अदने से पाकिस्तान से मात खा रहा है । पांच भारतीय जवानों को गश्त करते वक्त मौत के घाट उतार देना बडा दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद है - यह सम्पूर्ण भारत के लिए दुःख का विषय है परंतु अब मात्र दुःख व्यक्त करने से कोई काम नहीं चलने वाला है । इस वक्त जरुरत है तो पाकिस्तान को एक कडे जवाब देने की -वो भी उसी की भाषा में। हत्या की है तो इसका इंतकाम भी पाकिस्तान के आंतकी सिपाहियों को ढेर करके ही लिया जा सकता है। भारत के नपुंसक शासक कुछ नहीं कर पाते। पाक बार बार हमारी सीमाओं पर आक्रमण करता है। कभी हमारे सिपाहीं के शीश काट ले जाता है - हम सहते है पूरे गर्व से सहते हैै और सैनिकों की शहादत को जाया जाने देते है- यदि इसे सहनशीलता कहा जाता है तो धिक्कार है ऐसी सहन शक्ति पर जो नपुंसकों को भी लज्जित कर दें। जब रणबांकुरे देश के लिए मर-मिटने को तैयार है , सर्वस्व समर्पित करने को तैयार है तो तो फिर रण का बिगुल अब तक क्यों नहीं बजाया गया । क्यूं बार बार इसकी कीमत हमारे जांबाज सैनिकों को चुकानी पडी। इन हमलों से साफ जाहिर है कि पाक कभी शांति चाहता ही नहीं था और न ही अब वो शांति प्रंक्रिया को बनाये रखना चाह रहा है और ये भी साफ है कि पाकिस्तान के सैनिक अभियानों में आंतकवादियों को पूर्ण सहयोंग रहता है। बल्कि यदि कहें कि पाकिस्तानी सेना भी आंतकवादियो ंसे कमतर नहीं है तो अतिशयोंक्ति न होगी। पाक नापाक है । वो जब से विलग हुआ है तब से भारत के खिलाफ उसके अभियान जारी रहे है और हम एकतरफा की शांति बहाली की कोशिशें बराबर करते रहें । नतीजा सामने है। वो तो छापामार युद्ध कर रहा है और हम उस पर रहम करते जा रहे है। रहम भी उस पर जो बार बार हमारी गर्दन पर छुरा चला रहा हो। पाक हमेशा से आतंकियो ंका गढ रहा हैं । जेहाद के नाम पर चल रहे आतंकी अभियान मानवता पर कहर बरपा रहे है और मानवीयता को तार तार कियें। ये कैसी लडाई लड रहें है ये बुजदिल लोग जो छिपकर वार करना जानते है, जो पीठ में खंजर घोंपने के आदि हो चुकें हैं। पाक के नापाक चेहरे की तस्वीर बार बार उभर कर आती है और हम उसे फिर भी दुलारते रहे, पुचकारते रहें उसके साथ प्रेम की भाषा बोलते रहें और वो उदण्डता करता जा रहा है । इसे भारत का बडप्पन नहीं कहा जा सकता , ये मेरे मुल्क के प्रशासकों, शासकों की सबसे बडी बेवकूफी है। अब हमें इस तरह चुप होकर नहीं बैठना चाहिए। भारत के पावन सिंहासन को कलंकित करती ये सरकार देश को लज्जित करने में अपना जितना हो सका योगदान दे रही है।  ये बेहद दुर्भाग्य पूर्ण ही नहीं आत्मा को कचोटने वाला है कि हम पाकिस्तान के हाथों,.... एक अदने से मुल्क के हाथों शिकस्त खाते रहे है और वो हम पर हावी होता जा रहा है । तो क्या समझा जाऐ भारत अपनी प्राचीन परम्परा का निर्वाह नहीं कर पा रहा है! हमारी तोपो को बारुद खत्म है या बंदूकों में जंग लगा है। हम क्यों इतने भीरु हुए जा रहें है कि कोई हमारे गालों पर तमाचे लगाये जा रहा है और हम बिना रोये बिना चिल्लाये बिना उसका प्रतिकार किये सह रहें है। हम इस तरह खुद को महात्मा बना रहें हैं! महात्मा!! ......यदि आज विवेकानंद होते , भगत होते, सरदार पटेल होते, चंद्रशेखर होते तो भारत की इस दशा पर रो पडते ......फफक पडते ..........हमे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाले ंदेश के असंख्य कर्णधार इस परिस्थिति में क्या चुप रहते ? मौन साधते? या फिर क्रांति का बिगुल बजता। क्रांति आज जरुरी है । देश के रक्षा मंत्री ही पाकिस्तान की इस करतूत पर आहत तो क्या होते वरन उसे क्लीनचिट दे देते है - ये दुर्भाग्य है वतन का कि जो इसकी आबरु को तार तार किये जा रहे है उन्हें पर हम रहमत बरसा रहे हैं।
देश की आंतरिक हालत बेहद नाजुक है। ये आंतरिक बहस का वक्त नहंी है ये है इस सम्पूर्ण मामलें को , पूरे प्रकरण को देश भावना से जोडना चाहिए न कि एक दूसरे को नीचा दिखाने में वक्त जाया करना चाहिए। फब्तियां कसना सीखना हो तो राजनीतिक गलियारों में होने वालो कार्यक्रमों में शिरकत करके आसानी से सीखी जा सकती है। देश को आंतरिक रुप से बंाटने की साजिश हो रही है। राज्यों का बंटवारा .....लोगो का बंटवारा .........आत्मा का बंटवारा ........बंटवारें की राजनीति, देश को भुला रहीं है........ हम अनेकता में एकता के पाठ को भूल रहें है। अब वक्त बहस-मुहाबिसों का नहीं वक्त है मजबूत सटीक और देश हित में निर्णय लेने का । अब वक्त आ गया है- पाक की नापाक हरकतों पर रोक लगाने का। होश में हमनें बहुतेरे काम किये है। पर सेना को आर्डर की जरुरत है और बूढें शासक युद्ध के नाम पर कांपने लगते हैं। उनकी शिराओं का रक्त सूख रहा है पर नौजवान पीढी बदला चाहती है ......देश जांबाजों ने देश के लिए बलिदान दिया उसका जवाब पाकिस्तान को दिया जाना जरुरी है। भारत को सरहद पर किये पाक के घिनौने कृत्य के लिए उसे सजा देनी चाहिए , पाक अब माफ करने के काबिल नहीं है। उसे मंुहतोड जवाब देना चाहिए।
वन्दे मातरम्! वन्दे मातरम!!
- सत्येन्द्र कात्यायन

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A