मंगलवार, 18 जुलाई 2017

चिंतन में चिंता...



पुरस्कार बड़ा ?

लेखक बड़ा?
पाठक बड़ा ?


दिलो पे राज करना?

पुरस्कार फिक्स?
लेखन फिक्स?
पाठक फिक्स?

स्त्री बड़ी ?
स्त्री विमर्श बड़ा?
विमर्शों के जंजाल में साहित्य फंसा ?

साहित्य क्या ?---
जो पुरस्कृत 
जो प्रकाशित
जो स्वान्त सुखाय

हाशिये पर कौन ?...
दलित
स्त्री
हिंदी लेखन
हिंदी

हाशिया कहाँ कहाँ ??..
समाज में 
साहित्य मे 
हम सब में

हिंदी क्या
आंग्ल युक्त हिंग्रेजी 
तत्सम युक्त संस्कृतनिष्ठ 
या भाषाओ का मिश्रित प्रवाह

जो लिखता, वह छपता कितना??
जिसने लिखा, वो पढ़ता कितना ??
जो पढ़ता, वह लिखता कितना?

चित्र बिका 
चरित्र लूटा
क्या सब झूठा
सच्चा क्या
नारे-नारे 
संवाद 
वाद 
विवाद 
वाद विवाद स्वाद
चखता कौन ???

मौलिक क्या??
आदमी
आदमियत 
रचना
रचनाकार
भाव 
भावना
स्वचुरित
या स्वरचित ???

कवि बडा 
अंदाज बड़ा 
ओहदा बड़ा 
मण्डली बड़ी ???

आलोचक बड़ा
या आलोचना 
आलोचना का स्तर???

आलोचना क्या 
तू मेरी 
मैं तेरी 
तेरी मेरी 
अपनी-अपनी

भूमिका क्या 
तूने मेरी 
मैंने तेरी
उसकी जिसकी 
पहचान बड़ी 
जान बड़ी

पुरस्कार बड़ा
पुरस्कार समिति 
प्राप्तकर्ता 
पुरस्कार का भविष्य???
????
ये कोई कविता नहीं केवल प्रश्न है प्रश्न वो जो साहित्य से जुड़े है लेखन से जुड़े है .बड़े छोटे भाव से जुड़े है. बुद्धि जीवी एक और बड़े छोटे के भाव को मिटाना चाहते है फिर भी इसके प्रकोप से स्वयं बच नहीं पाते.
भारत में तो जुगाड़ से बहुत कुछ हो जाता है . माइक संभाल के हर कोई नारे लगाने की मुद्रा में आ जाता है.पर सच पर कालिख पोतने की साजिश भी रच देता है. हम बोलते है सुनते कम है. लिखते है पढ़ते कम है. बिकते है रचते कम है. हम हिंदी को चाहने की भीड़ में !!! हम वाद को बढ़ावा देते स्वयं में वाद बन जाते बुनियाद नहीं पाते. अते पते कहते कहते खुद की बात तो भूल ही जाते...क्यों??जो पढता वो पाठक कम हैपृष्ठ पलट कर आलोचना गढ़ता आलोचक सार स्वयम् ही समझ न पाये तब आलोचना क्या?पुरस्कारों के लिए पाठको की राय /वोट भी लिया जाना क्या उचित नहीं??प्रश्न अधूरे उत्तर पुरे कैसे होंगे????


साहित्य का बाज़ार होना कहाँ तक सही है?...संवेदना बिकाऊ हो तो वह हृदय तक कैसे पहुंचेगी ? ...आज का साहित्य जन जन का कब हो पायेगा?...बौद्धिकता ने तर्क दिए पर आस्था ग़ायब ? दिमाग शब्द जंजाल कब तक ढोयेगा?...क्या आज के साहित्य में विचारों की आज़ादी बची है या लीक को पीटा जा रहा है ?...आज का साहित्य समाज पर कितना असर डाल रहा है और समाज से कितना प्रभावित है? साहित्य के लिए समाज कितना बचा है? ..क्या साहित्य का समाज सिमटा है? ...साहित्य किसे माने?..किसी बड़े लेखक के लिखे को या किसी बड़े ओहदो से निकले शब्दों को या जन के मन को मथने वाले भाव को या जो कुछ लिखा कहीं भी लिखा उसको ? ....प्रश्न और भी होंगे आपके,मेरे हम सबके.....कृपया इन प्रश्नो पर विचार कर नए विचार से अवगत कराएं ..

# चिंतन में चिंता

-सत्येंद्र कात्यायन

1 टिप्पणी:

अकविता

  https://youtu.be/M_txJ7Q8f1A